Akele Man Ki Talash: Philosophy of Loneliness and Freedom

Indiandarshiki

एक खामोश तन्हा मन उदास बैठा सोच रहा था कोई आये और उसे वहाँ ले जाए जंहा उसको भी दुसरे प्यार करे। जंहा उसका इस्तमाल ना हो, हो भी तो उसको दीदार हो खुश्किसमती का। जब झलकता है प्याले से पानी तो ज़मी से जमीं मांगके नहीं गिरता ना ही इज़ाज़त होती है प्याले की। वो या तो भीखरने की चाह से , या तो समंदर में मिल जाने की रौब से गिरता है। मन भी खुदको ऐसे ही सोच में डुबोके आगे बढ़ता है कि वो अब अकेला कहाँ रास्ता पकड़े, भीखर जाए या फिर हिम्मत कर समंदर की जंग में शामिल हो जाए। वो मौन होके आबाद हो जाने का इंतज़ार करता रहा। लेकिन कोई परिंदा ख़त देने नहीं आया ना कोई बुलावा था। 

           वो उठा और ऊचाई से नीचे देखा तो हर एक मन आपस में बंधे हुए खुश थे और बैचेन आंधी को महसूस करके वो नीचे जैसे-जैसे करीब जाता उन्ही मन को दूजे के मन का ख़्याल रखने की हुड में पाता और देखता अपने अंदर की तरंग से कि हर एक मन खुदको वहम में पालकर दूजे के मन के रास्ते मापता है। लेकिन उस उदास मन को और ज़ोर से बैचेनी हुई वो झटपटा रहा था ये जानने कि क्या खुदको किसी और के हवाले कर देने से " सुकून की छाह " नसीब होगी !!! वो परखने के अंदाज से और करीब गया और देखा ये मन उससे भी ज्यादा अकेला है वो घुट रहा है ताकि बाहर की तिस्लगि को झण भर की खुशियाँ दे सके। और ऐसा करके वो गुलाम मन खुदको आज़ाद के भरम में रोज़ डालके झटपटाहट या कभी फरेबी की सीडी चढ़ता रहता है । 

               ये सोचके उदास मन ने खुला रास्ता देखा जंहा जाके वो अपनी प्यार की तलाश पूरी कर सकता था। लेकिन वो पहले से तेज रफ्तार लिए शोर-सी लग रही बैचेनी को महसूस करने लगा और कदम-कदम में वो अकेलापन उसको प्यार से पुकारने लगा जो पहले खामोश था। वो उदास मन रुका और रास्ते को निहारके वापस लौट गया उसी जगह जंहा वो अकेले बैठा घुट रहा था कि उसको भी प्यार नसीब होगा। 

             लेकिन कुछ ही देर बाद खामोश अकेलापन जो प्यार से पुकारा था वो सुकूँ में लौट गया तब अकेले बैठा मन कहता है " मैं  अपनी आज़ादी की लड़ाई अपनाऊँगा । जो प्यार मैं बाहर चाह रहा था वो कुछ पल की रंगीन छाया होगी और बढ़ते हुए मन के अकेलेपन का शोर । " 

             लेकिन ये कठिन रास्ता उसको सरल जिंदगी की तरफ ले जायेगा उसको महसूस हुआ। और वो उठा जैसे एक योध्दा उठता हो अपनी जिंदगी में सच्चाई बिखेरने के लिए। 

**"इस अकेले मन पे हँसते वो सारे गुलाम मन को क्या पता था कि उनकी हँसी पे ये अकेला मन गुरुर से मुस्कुराता है।"** 


~ indiandarshiki • shivani ☺☺☺☺




* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows





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