Invisible Hand: The Dariyaganj – लखनऊ का बाज़ार, गरीबी-अमीरी और ट्रस्टीशिप

           


लखनऊ का दरियागंज ना तो राकेश को और ना ही राॅकी को कभी भूल पाया , शायद इसलिए कि इनकी माँ सालों पहले इसी बाज़ार के शोरगुल में मिली थी और ये झूमती चिल्लाहटे आज जैसे गायब-सी है, जो पहले मिलजुलके अमीरी-गरीबी को एक कर देता था आज वही दरियागंज दुखी था। उसका रूप जैसे-जैसे बदलता गया उसकी रूह वैसे-वैसे खोखली होती गई । राकेश - राॅकी की माँ इन बाज़ारों के नयेपन में कैसे अलग हो गई वे इन दोनों के बेटो के नाम से ही समझा जा सकता है। राकेश जो बेशक तय नाम के अनुसार, गरीब था और राॅकी अमीर। और इन नामों में भेद समाज ने तो किया ही, लेकिन इस समाज को मजबूर किया , " बाज़ार के अदृश्य हाथ " ने। देखते है कहानी है क्या : 


राकेश एक बड़ी मॉल के आगे अपनी छोटी-सी समोसे-चाय की दुकान चलाता था, उम्र में 28 का होने के बाद भी वो ना जाने कितनी बार सोचा होगा कि दुकान का नाम अपनी पहचान छुपाके रखू या पहचान के साथ। 

        जद्दोजहद के बाद उसकी माँ सोनसी ने कहा : बेटा ! ये तेरी परीक्षा का वक्त है , ये मत सोच कि जो खाई इस बाज़ार में बन गई है वो तुझे और गरीब बनने में मजबूर कर देगी। चाहे जो हो , तुझे वही नाम रखना है जो तू है, जो तेरी पहचान है क्युकी पहचान सरकार की तरफ से दिया गया एक थप्पा भर नहीं हैं। ये पहचान तेरा चरित्र है। 


राकेश : हाँ माँ, मैं वैसा ही करूँगा। 


राकेश ने ठेले का नाम रखा " राष्ट्रीय खिलाडी की खिलाडी चाय " ... बस बाज़ार में सालों पहले के शोरगुल से काफी कम शोर के बीच सन्नाटे ने अपनी जगह चुपके से बनाई और उधर बड़े मॉल से निकलके राॅकी अपने हायेफ़ाये दोस्तो के साथ बड़ी गाडी की तरफ चला तभी उसकी नज़र राकेश के ठेले के नाम पर गयी और उसने अपने दोस्त सुसम से कहा : चल उधर खिलाडी चाय पीते है। 


सुसम : पागल वो गंदी-सी दिखने वाली चाय पियेगा। तेरे पापा बिजनेसमैन है तुझे कबसे पैसे की बचत की सुझी? 


राॅकी : इसमें शर्म की क्या बात है? तू...  


सुसम : तू ता कुछ नहीं, तू जा मुझे क्लब जाना है, हम सब कैफे से सीधा क्लब जायेंगे। तू जा अपनी शान बेच खा... 


राॅकी : ठीक है, बाय... 


राॅकी एक सेकंड सोचा और " ठीक है " बोलके चल दिया। वो एक सेकंड एक पल के लिए उस दरियागंज ने भी सोचा होगा जो सालों पहले हँसते-खेलते बाज़ार को असली बाज़ार की तरह देखती थी , जो आज सिर्फ एक जिंदा लाश की तरह था । 

                 ये दरियागंज दो हिस्सों में बटाँ था, एक गरीब का गरीब बाज़ार और एक अमीरो का अमीर बाज़ार। इन हिस्सों को राॅकी के पापा जैसे कितने ही बिजनेसमैन ने अपने फायदे के हाथ से बड़ी मुश्किलो से बनाया था। राॅकी , राकेश के पास गया। 


राॅकी : एक चाय दो... तुम खिलाडी हो? वो भी राष्ट्रीय स्तर के... नैशनल चैंपियन? 


राकेश : जी, हूँ लेकिन... 

राॅकी : मुझे समझ नहीं आया तुम यहाँ कैसे...! 

राकेश : इसलिए क्युकी मेरा परिवार गरीब था। अमीर होता तो मुझे इतनी मेहनत थोड़ी करनी पढ़ती...!!! अवसरों की तलाश मैं क्या करता , वो खुद मेरे पास आके मेरा पैर दबाती। 

राॅकी : हम्म...! चलो मुझे सिखाऊगे जो तुम खेलते हो। 

राकेश : खेलता था ! टेनिस ! और मैं नहीं सिखा पाऊंगा... 

राॅकी : क्यूँ? 

राकेश : क्युकी तुम अमीर हो और अमीरो से मैं दोस्ती नही चाहता... 

राॅकी : क्यूँ? 

राकेश : क्युकी, मेरी माँ गरीब थी जिसकी बेज्जती उनकी अमीर सहेली ने की थी। असल में समाज, कंपनियों के हाथो के सहारे बदलता है क्युकी कंपनियां अपने व्यापार के लिए पहले समाज में आवश्यकता पैदा करती है और उस पौधे को गरीबी-अमीरी की खाई बनाके सींचती भी है । ( एक गहरी सांस भरके ) 

               पहले ये दरियागंज, अमीरो गरीबो को एक साथ मौका देता था पैसे कमाने का। एक ही दुकान में चाय पीने का और सामान का मोल भाव करने का। और अब गरीब वो खरीदता है जो अमीर पहनके फेक देता है। 


राॅकी : लेकिन मैं इसे पुरी तरह नहीं मानता, मैं इतना कमजोर नही जो शब्दो से गड ना सकूँ कि मेरा दोस्त पैसों से गरीब है और महज पैसों से कमजोर होना ही गरीबी को बताता है तो उसका क्या जो आत्मा से , दया से और इंसानियत से अमीर है। ये बस एक धोका है धोका... तुम गरीब हो क्युकी तुम समझते हो गरीब खुदको... पैसे से हो , आत्मा मर गई तुम्हारी ... ? 

              मेरी माँ कहती है, समाज और उसकी सभ्यता संस्कृति गढ़े उसके पहले बाज़ार का वो अदृश्य हाथ अपना हाथ टटोलता है। ये हाथ जो अपने महंगे भोग के सामान को बेचने के लिए उसको संस्कृति से गढ़ता है जिसका माध्यम है समाज, बस समाज। 

                 " तभी तो मेरे दोस्त कहते है, हम अमीर है हम 50 हजार के जूते पहनेंगे , सस्ती चीजे हमारी शान के खिलाफ है । " 

                                   ये बाज़ार के हाथ अपनी कंपनियों के लोगो को बस माध्यम मानती है। ताकि जितनी तंख्वा उनको मिले उसकी महज 2% जमापूंजी उनके पास बच पाए। और जब बाजार ही सब तय करे, तो वो तुम्हे क्यूँ अमीर बनने का मौका देगी, वो मुझे देगी क्युकी मैं अमीर हूँ और उन्हे यकीन है कि मैं गरीबो को अमीर नही बनने दूंगा...! 

                   अपनी साँसे हौले से ऊपर लेते और छोड़ते हुए सर नीचे करके राॅकी : और मैं अमीर हूँ इसमें मेरी गलती नहीं... मेरी माँ राधा ने तुम्हारी माँ सोनसी से शादी के बाद दूरी बनायी इसमें मेरी गलती नहीं।


राकेश : क्या? तुम राधा मासी के बेटे हो? 


काफी देर से राधा गाड़ी से उतरकर सीधा राकेश के ठेले में राॅकी के पीछे चुपके से बैठी थी, उसने ये बात सुनते ही कहा : हाँ , मैं और सोनसी शादी के पहले से दोस्त थे। लोगो के नज़र में मैं सुंदर थी इसलिए मैं अमीर के घर गई और वही लोग सोनसी को सुंदर नहीं समझते थे इसलिए वो गरीब घर गई। बल्कि वो कमाल की विचारक और वैज्ञानिक सोच की लड़की है । 


राकेश : आपने मेरी माँ की बेज्जती की थी इसलिए क्युकी वो गरीब थी और आज आपका बेटा मुझसे दोस्ती करना चाहता है। वाह...! 


राधा : क्युकी उसकी परवरिश मैंने की है जैसे सोनसी ने तुम्हारी की। 


उधर पीछे से सोनसी दुकान बन्द करने आयी और राधा को देखके आँखों में आँसू लिए एक टक उसी जमीन में खड़ी रह गयी और धीमे से कहा : बेटा, ये राधा मासी है। 


राकेश : हाँ माँ और ये उनका बेटा जो मुझसे दोस्ती चाहता है ताकि अपने दोस्तो के सामने वैसे ही मेरी बेज्जती करें जैसी आपकी की थी इसकी माँ ने। 


सोनसी : नहीं, इसकी आँखे बताती है कि ये कमजोर नही है। 


राधा : ये जो दूरी हमारे बीच बनी है वो समाज से पहले बाज़ार ने बनायी है। और ये दरियागंज इस बात का सबूत है, इसे भी खेद है कि ये अब अपना असली अस्तित्व खो चुका है और मेरे पति जैसे चुनिंदा लोगो के हाथो की कठपुतली बन गया है। 


सोनसी : हम्म...! सही मायने में ये चुनिंदा हज़ार लोग जो करोड़ो लोगो को नचाते है वो बस इनके " ट्रस्टी " है । 


राकेश : ट्रस्टी? 

राॅकी : हाँ...! ट्रस्टी... जब एडम स्मिथ बाजार के invisible hand की बात करते है तब गाँधी इन्ही बाजार के Trustyship / ट्रस्टीशिप की बात करते है। बाजार के ये गरीब-अमीर का दो हिस्सा अमीरो को, कामगारों , मजदूरों और सेवको का महज रखवाला मानता है। 

                " उनकी मेहनत के एक बड़े और सच्चे हिस्से के पैसों का रखवाला " । 

 

सोनसी : हाँ इतिहास में क्रांति भी तब-तब आयी है जब-जब चिथडो में सने , लिपटे कमजोरों ने ताकत से इन ट्रस्टियों से सिर्फ अपने हिस्से ही नहीं लिए, बल्कि पूरे समाज की शक्ल भी बदल दी। तभी पैदा हुआ असली फ्रांस, असली रूस। 


राधा : लेकिन इन अमीरो ने इतिहास से सिखा और गहरी ठंडी चाल के साथ सारे दरवाजे बंद कर दिये। क्युकी सरकार बस शक्ल है जिसके सरकारी हाथ, बाजार के इन्ही " अदृश्य हाथों " के सहारे चुपके से नाचते है। जिसमें पूरे गरीब , कम गरीब , और थोड़े कम गरीब यानी मध्यम वर्ग बिना समझे बहती नदी में बहते है। 


राॅकी : मैं अमीर हूँ और तुम गरीब इसलिए हम इस लिहाज से दोस्त ना बने लेकिन मैं इंसान हूँ और तुम इंसान हो इस लिहाज से तो बन सकते है? 


सोनसी राकेश को प्यार से देखती है और गले लगाके कहती है : लोग बस वही करते है जो उनके invisible यानी अदृश्य मालिक करवाते है। वो जो आज सोचेंगे , कल नहीं सोचेंगे यदि पैसे की भुक अपनी सोच बदल दे तो। तभी तो तुम अव्वल खिलाडी होके भी सड़क में हो । इसलिए इंसान से दोस्ती करो अमीर से नही। राॅकी महज अमीर नही है क्युकी उसके पहले ये इंसान है। 


राकेश : मतलब गरीब इसलिए गरीब है क्युकी वो अमीर बन गया तो, पहले से बने अमीरो के कपड़े और झूठे सामान को सस्ते दामो में कौन खरीदेगा। वो फेकने में ना जाए इसलिए हम गरीब है। 


राकेश, राॅकी की ईधर-उधर लहराती , सोचती नज़रों को देखके : हाँ मतबल... यानी मतलब , पैसों से गरीब है।।। 


सारे लोग ज़ोर से हँसे और राॅकी ने राकेश को पहली बार मॉल में जाते हुए देखा, लेकिन वो दरवाजे में ही रुक गया तब राॅकी : क्या हुआ ? चलो... 


राकेश : ये इतना साफ चमक रहा है कि... 

राॅकी : की? 

राकेश : कि ये शान शौकत मुझे मेरी हैसियत दिखाके हंस रही है... 

राॅकी : चलो , मुझे हाथ दो... हँसने दो इन चमक को... इनके फर्श गंदे होंगे , तुम्हारा कपड़ा इनसे गंदा नही होगा... तुम जो हो उसपे अडे रहो... 


और वो invisible hand अपनी हंसी को दबाके धीरे-धीरे गायब हो गया एक ऐसी जगह जंहा उसके फर्श हर पल गंदे होने वाले थे जंहा क्रांति रची जा सकती थी... जंहा बुर्जुआ कुचले जा सकते थे..... आज दरियागंज खुश था... 


* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows * 



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