नियति

      धुंधलाई हुई कांच में ओंस  - रोशनी के छू जाने से चमक उठी। उसी ओंस को अपने पल्लू से पोछकर एक युवा किशोरी खुदको निहार रही थी। ना जाने क्यूँ उसे अपने होने पर मलाल था। उसकी भीतरी पुकार ने उससे कई कहानियाँ पूछी और अस्तित्व के सवालों से उसके मस्तिष्क को जकड़ दिया , कि क्यूँ वह अपने आप में स्वतंत्र नहीं हैं ! क्यूँ उसके भीतर शोर गुँज रहा है! क्यूँ शांति - सन्नाटा नहीं हैं ! वह समझ रही थी कि, कुछ-न-कुछ अपने आस-पास की झूमती घटाओ में भावहीन गन्ध या रंग घुला हुआ है। अब तो उसे सुबह की औंधी खुशबू भी धुली-मिली-सी लग रही थी। यह सब सोचकर वह काँच के सामने से उदासमन से हट चली रसोई-घर की ओर । शायद उसकी आत्मा की आवाज पर किसी दूसरी चंचल आत्मा ने राज किया हुआ है। जो उसे उसकी जिंदगी जीने के तरीको का आदेश देती है।

      यह आवाज , यह आदेश किसकी थी ! यह दूसरी आत्मा किसकी थी ! वह समाज की जहां , पुरुष और महिला अनेक क्रियाकलापों व नियमों का निर्माण करते हैं। या उस समाज की जहां , पुरुष खुदसे अनेक सिद्धांतों और नीतियों को अपने स्वार्थानुसार सभी और महिलाओं के लिए जड़ता है ! यकीनन दूसरे समाज का रस , इस मोहकमन-सी किशोरी को आदेश देता रहता है। जिस कारण वह उदास गुलाम-सी बेबस होकर रसोई घर की ओर चल दी। क्या यहीं उसकी नियति है? 




* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows * 

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