कली : kali

 



एक दास्ताँ ऐसी जो करीबियों को दूर तो दूर बाशिंदों को करीब करती है  और अपनी उलझी घटाओ-सी चुन्नी के भीतर सहमकर अचानक खुदको, ठंडी मध्यम गीत गुनगुनाती हुई लहरों में अमृत में घुली चासनी की तरह घोलती चली जाती है। बेशक ! वो चंचल, साफ लेकिन महीन छाँव रंग की, बलखाती हुई अदाओ वाली , खुशबू के गन्ध को अपने में बिछाए हुई बेहद मर्म भाव-सी सुकन्या कली थी। जिसे अक्सर धूप में धूप से ज्यादा उन लोगो की नज़रे जलाती थी जिसे वो बचपन में खुद्दार , ज्ञानी समझकर उनके इर्द-गिर्द झूमती रहती थी। हाँ ! ये व्याख्यान  स्वाभिमानी लड़की के किशोरी वृतान्त से ओत-प्रोत है  । 



* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows *  


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