Mahila ek khilauna? Ek mahila mujhe bhi , ek tujhemei bhi





-"मैं सशक्त हूँ, महिला सशक्त है !"-

तू समझता क्या है खिलौना नही हूँ मैं ,
चल आसमान तो नहीं, बेशक ज़मीन भी नही हूँ मैं ।

यूँ तो बाह तुझसे हल्के है तू हियाव की बात कर , 
यूँ तो बाह तुझसे हल्के है तू हियाव की बात कर,
फिसलकर इसी ज़मीन में आएगा ;
हाँ लड़की हूँ , लड़का नही हूँ मैं । 

सोचता क्या है बोल भी दे , फ़टे मत मुँह से कह भी दे ,
सहना आ गया है हमें , 
सहना आ गया है हमें , 
लिहाजा बंधी हुई गाय नही हूँ मैं ।।

तू चीख - चिल्ला ले , बहुत सालो से राज था तेरा ,
डर क्यूँ रहा है लड़की ही तो हूँ , राज-पाठ दे ; 
डर क्यूँ रहा है लड़की ही तो हूँ , राज-पाठ दे ;
यकीनन महफ़िल की नुमाइश-सी ही नही हूँ मैं ।।

दो कदम चलू तो रोक देता है ज़माना मुझे ,
हाय कितना डरपोक है ।
दो कदम चलू तो रोक देता है ज़माना मुझे ,
हाय कितना डरपोक है ।
, अरे ! समझ ;
तेज लौ हूँ ; हवा का क्षौंका नहीं हूँ मैं । 

चल पड़ी तो हूँ बराबरी करने तुझसे तेरा रास्ता थोड़ा साफ है ।
चल पड़ी तो हूँ बराबरी करने तुझसे तेरा रास्ता थोड़ा साफ है ।
फिर भी तू पीछे और दो स्तर ऊपर उठ चूंकि हूँ मैं । 


कुछ बहुत सालों पहले तूने नस्ल को बेच बांट दिया था समाज अब समान हिदायत तो है , 
अब समान हिदायत तो है , 
फिर भी तू सोचता ;
लड़की हूँ ; 
रात को टहल तो भाई से पहले खाना - खा नहीं सकती हूँ मैं

ठीक है सीख ले राम जैसे भाई-दोस्तो से ,
थूकता क्या है ज़मीन में , ख़ुद्दारी नही दिखती तुझमें ,
थूकता क्या है ज़मीन में , ख़ुद्दारी नही दिखती तुझमें
मज़ाक-सा है तू
मज़ाक-सा है तू
तामाशा नही हूँ मैं ।

तू सोचले तू अच्छा , शरीफ बन तू घूमते रहें 
हूँ मैं बुरी हाँ मैं बुरी ही ठीक हूँ ।
तू सोचले तू अच्छा , शरीफ बन तू घूमते रहे
हूँ मैं बुरी हाँ मैं बुरी ही ठीक हूँ ।
आँगन की फजीहत तो बिल्कुल नही हूँ मैं ।

हज़ार कमियां है मुझमें , मैं नवाब की शहजादी नहीं ।
रेगिस्तान में चलती हुई मुशाफिर हूँ , 
रेगिस्तान में चलती हुई मुशाफिर हूँ , 
प्रेम के जहर का प्याला नही हूँ मैं ।


बेशक ! नज़र से देख तेरी नज़र है , प्रेम से देख तेरी क़दर है ।
बेशक ! नज़र से देख तेरी नज़र है , प्रेम से देख तेरी क़दर है ।
गंदी निगाहे गड़ाके अस्तित्व खुदसे बिखेर रहा है तू ,
तू आवारा है
तू ; आवारा है ।
हाँ ! , तू आवारा है... 
" सड़को में घूमती हुई प्रदर्शनी नहीं हूँ मैं । " 


तू समझता क्या है खिलौना नही हूँ मैं , 
चल आसमान तो नही , बेशक ज़मीन भी नही हूँ मैं । 




* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows * 

टिप्पणियाँ

Jyoti ने कहा…
It's a good and positive approach in your lines

लोकप्रिय पोस्ट