गाँधी हिंदूराष्ट्र के विरोधी क्यूँ !
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# गाँधी हिंदूराष्ट्र के विरोधी क्यूँ !
गाँधी गीता को मानते थे । वह खुदको गीता के विचारों का सार्थक मानते थे । इसीलिए वह भारत को एक धर्म के भीतर कट्टर रूप में जकड़े नहीं देख सकते थे। वो आत्मीय धर्म को मानते थे जो मानव को धर्म में बाटकर उसके साथ सही-गलत करने का निर्णय नहीं करती बल्कि मानव को मानव समझकर उसे पूजती है।
गाँधी जी नहीं चाहते थे कि हिंदुस्तान भी पाकिस्तान की तरह कटटरवादी बनके खुदका आत्मीय विनाश कर दे। हमें हिंदू की पवित्रता और उसके आदर्शवादी सिद्धांतो को स्वयम् में आप्त करने की ज़रूरत है जो मर्यादा , कर्तव्य और प्रेम का सीधा प्रतिक है। सनातनी सनातनधर्म के प्रेमभावी , विनम्र आदर्शो पर चलता है ना कि उन सिद्धांतो और आदर्शो में स्वउपजी सोच की मिलावट करके एक राष्ट्र को जकड़े रखना चाहता है। और ऐसी सोच वाला व्यक्ति स्वयम् को सनातनी कह भी दे परंतु रूह से वो सनातनी नहीं कहा जा सकता । और यह बात भलाई समाज ना जाने लेकिन ईश्वर जानता है । इसलिए गाँधी जी बँटवारे और उसके बाद हिंदूराष्ट्र बनने के सक्त विरोधी थे।
* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows *



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