'अभाव' ~ एक धूप





आईये बात करते है धूप की ! धूप जो एक उजाला है वह इससे परे रहने की प्रकृति भी रखता है। जिसका अस्तित्व तो है लेकिन मूल्य 'अंधकार' के अस्तित्व और उसके साथ अपने तालमेल पर टिका है। जिसे भारतीय दार्शनिक (न्यायवैशेषिको) ने "अभाव" दर्शन में विस्तार से समझाया है। जो यहाँ एक व्याख्यान के माध्यम से वर्णित है। यहां , धूप का सम्बन्ध " प्रकाशीय किरणों " के साथ ही ,  सर्वस्व विधमान "प्रकाश" से है , जो नई उमंगमयी दिशा की ओर संकेतित है। 

                             प्रश्न सर्वप्रथम यह है कि , क्या धूप के रूपों को ब्रम्हांड में हर एक क्षेत्र तक विस्तारित सिद्ध किया गया है ? यदि हाँ तो धूप की अपनी सत्ता है । लेकिन नहीं, तो क्या धूप की सत्ता नहीं है ! इन दुविधायों के कई स्तर है जिसे दर्शनशास्त्र और विज्ञान में प्रमाणित किया गया है कि धूप की सत्ता, व्यापकता और पहुँच कितनी सिद्ध है। लेकिन धूप को साहित्यिक - कवितामयी दृष्टि से आँका जाए तो इसकी काल्पनिक प्रवृत्तियाँ दिखाई देती है। जिन्हे तथ्यो की आवश्यकता नहीं होती। 

                              वैज्ञानिको और दर्शनशास्त्रो ने प्रकाश को ज्यामितीय रूप में दिखाके 'प्रतिमान' माना है, जिसका दार्शनिक दृष्टिकोण से अभिप्राय 'साक्षात ज्ञान' होना है। परंतु इन तार्किक वर्णन के साथ यह भी सिद्ध है कि प्रत्येक रूपों का एक विपरीत रूप अवश्य होता है। और यह रूप-प्रतिरूप अस्तित्ववान होने के साथ ही मूल्य की आपसी निर्भरता भी रखता है । जो एक दूसरे की जीवंतता हेतु महत्वपूर्ण है। 



* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows * 




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