क्या किसी को भुला जा सकता है!
अक्सर ये सवाल सभी के ज़हन में उठता है कि क्या किसीको भूलना आसान है ? क्या ये मुमकिन है? भूल जायेंगे तो क्या तकलीफ़ कम होगी या खत्म होगी? आदि । लेकिन इन सवालों में भी एक सवाल उठना ज़रूरी है कि जैसे पानी को मुठ्ठी में बाँधना मुमकिन नहीं, वैसे ही वो सभी चीज़े नामुमकिन है जो खुदमें स्वतंत्र सत्ता रखती है अर्थात जो हमारे बस में नहीं। अत: किसीको भूलना नामुमकिन है इसलिए उसकी कोशिश करना खुदको परेशान करना है। प्रसिद्ध पाश्चात्य दार्शनिक ' प्लेटो ', प्रत्यय की एक मात्र सत्ता स्वीकार कर इसे सभी ज्ञान का आधार मानते है। उनके विवेचन के अनुसार, प्रत्यय (idea, विचार) ही सत् है। हालांकि बाद के दार्शनिको ने इसपर कई विवेचन दिये है जो विश्वसनीय है।
प्लेटो के कथन से हम कह सकते है कि, विचार स्थायी है , साध्य है इसलिए इससे भागना या कोशिश करना समय और स्वयम को बर्बाद करना है।
इसलिए किसीको भूलने की कोशिश करने के बजाए उस सभी पल को , जो अच्छे और बुरे दोनों है , स्वीकार कर लो एवम उसे महसूस करो और सोचो कि वो सभी शख्स जिसे आप भूलना चाहते हो वो आपकी जिंदगी में आपको सवारने, मजबूत बनाने और इस जमाने की रीतियों से लड़ने के लिए आये थे। जैसे ही उनका काम खत्म हुआ वो फरिस्ते की तरह चले गए, वो लोग प्रेम, गलत दोस्ती या लोग के रूप में होते है। सोचो यदि वो ना होते तो क्या तुम आज ऐसे होते जैसे अभी हो? और बात प्रेम की है तो वो आज़ाद होता है उसे आज़ादी चाहिए होती है फिर किसीको पाने या खोने के उलझन में अपने प्रेम को क्यूँ मैला करना।
प्रेम के संदर्भ में, इतना शुद्ध प्रेम करो कि उसमें आप की खुशी उसके बाद हो, उसमें आप हो ही नहीं , बिल्कुल नहीं।
* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows *



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