गुँगापुल : gungapul , ANDAR KI AAWAJ
रामू पास की नहर के ऊपर बने कच्चे पुल पे आगे जा रहा है , जंहा पे उसका घर था वहाँ से आगे । आगे बढ़ते-बढ़ते एहसास ऐसा था कि वो अकेला टहल रहा है और बेशक देखने वाला भी उसको अकेला ही जाने। लेकिन वो सोचता कि क्या सचमें वो अकेला है ?
रामू का अकेलापन उसके अंदर की एक ख़िस की तरह थी जिससे वो उभरना चाहता था लेकिन पता तो हो कि, वो अकेलापन बाहर नही अंदर है। उसके हाथ में कोई साथ नहीं और ना ही साथ में कोई हाथ जो जिंदगी की तरफ आगे ले जाए। दोनों ही बाते ऊपर से बचकानी थी लेकिन इस सच को मान लेना मुश्किल था तो बचकानी ही लगे , रामू को ये बात तो अंदर में कोई बोल रहा था।
कोई बच्चा आके रामू को आवाज लगाता है और उसको रोकता है पर मदहोश-बेहोश रामू सुन नही पाता या सुनना ही नही चाहता ये तो रामू का मन ही जाने। वो तो मन ही है जो उसको पुल पार करने नही दे रही। वो बच्चा आकर उसका हाथ पकड़ता है और बोलता है : आप चुप ही क्यूँ रहते हो कभी बोलते नही देखा आपको ?
" आप चुप ही क्यूँ रहते हो? " ये बात रामु को अजीब लगी क्युकी वो दिन भर जितना बोलता था उतना शायद ही गाँव में कोई बोलता हो बस सोते वक्त ही तो वो चुप हो पाता है तो क्या सारे लोग सोते वक्त भो बोलते है? , रामू कहा। लेकिन बच्चे को सुनाई नही दिया शायद।
उसने फिर हाथ जोर से हिलाया और बोला : क्या देख रहे हो भैया, मै इतना भी खूबसूरत नही हूँ अभी।
रामू बोला : तुम १० साल के हो और अब से महज 30-40 साल ही खूबसूरत रहोगे फिर जो चले ही जाने वाला है उसको क्या निखारु?
बच्चा बोला : बोलते क्यूँ नही, बोलो, गूंगे तो नही हो गए?
रामू आगे जो बोला उसकी बोली बच्चे को सुनाई दी, पिछली वाली बात उसको सुनाई नही दी, पता नही क्यूँ!!!
रामू बोला : क्या छोटू तुम्हे मेरी बात सुनाई नही देती क्या?
बच्चा : अरे भैया, बोलोगे तब ना। चलो मै जाता हूँ .
रामू अशमंजश में घूमता रहा और आगे पुल के किनारे में बूढ़े दादा जी दिखे, उनसे कहा : दादा मै जो बोलता हूँ वो बच्चा सुन नही पाता। क्या वो बहरा है?
दादा : नही रामू वो बहरा नहीं है। तुम शायद खुदसे मन ही मन बोलते होगे।
रामू : मन ही मन तो नही लेकिन हाँ! खुदसे तो बोलता ही होगा।
रामू फिर पीछे मुड़के पुल के बीच खड़ा हो गया और बोला : मेरा बोला जाना सही मायने में तब बोला गया माना जायेगा जब मै शब्दों में फँसे उस बोल को आवाज में तब्दील नहीं कर देता । ये आवाज ही तो है जो दूजे को सुनाने का या खुद सुनने का एक जरिया है । फिर जब कोई मुझसे कहता कि तुम कम बोलते होतो खिस होती है, क्युकी बोलना तो मैने कभी बंद किया ही नहीं। बस आवाज में उसको बदला नही। इसलिए हर वो शख्स ज्यादा बोलता है जो दुसरो को नही बल्कि खुदको अपनी कहानी सुनाता है । ( रामू आवाज में बोला था, जो दादा ने सुना )
पीछे से बूढ़े दादा बोले : वैसे ही जैसे एक गाड़ी चलाता हुआ छोटू , खुदको उतनी तेज से थोड़ा ज्यादा चलता हुआ पाता है जितनी थोड़ी कम तेजी से चलती हुई गाड़ी को , यही पुल के पास बैठा हुआ रामू देखता है या ये कहे महसूस करता है। जबकि उसकी गति स्थिर है बस महसूस देखने और चलाने वाले को अलग-अलग होता है...
रामू : मतलब गति नज़रिए में है? मेरा अपना नज़रिया और गाड़ीचालक का अपना नज़रिया?
दादा : हाँ कह सकते है! गाड़ी से गुजरी हवा उसकी आँखों में गूंगेआँसू लाती है और देखने वाले उन आँसुओ को नही देख पाते क्युकी वो तेज सरसराती हवाऐ पाठक को नही छूती। इसलिए देखने वाले तुम्हे गुँगा या उदास जानेंगे जबकि तुम खुदसे दिन भर कितनी ही बाते कर लो...
रामू : हाँ लोग जो देखेंगे वही जानेंगे , फिर तो दोष उनका है ही नहीं। बात बस नज़रिए की है।
दादा : हाँ जैसे पास के हमारे प्यारे चाचा ने शरीर छोड़ दिया। लेकिन वो जिंदा है।
रामू मुस्कुराके : हम्म ! या तो इस गाँव के ख्यालो में या...
दादा : या फिर, किसी दूसरे नये शरीर की नई ज़िंदगी में। जंहा उसको इस जले हुए शरीर की कहानी का कुछ याद नही। महज...
रामू : महज खुदको जान लेने के... "आमीन" ...
~ indiandarshiki : shivani
* Part of Indiandarshiki : inner light in poetic shadows *



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