“Hawayein / हवाएं : The Winds of Love, Pain & Freedom – A Journey Within "


Indiandarshiki:Hawayein
एक-दो पल ऐसा लगा जैसे सारी चीजें अच्छी हो रही है , ये हवाएं जो छुके जा रही है एक नमी दे रही है ताकि भीतर की चिंगारियों को शांत किया जा सकें , लेकिन कुछ पल ये हवाएं तीखी छिन्न लेके आती है जो अंदर में खिन्न पैदा करती है और सब बिगड़ता हुआ लगता है । ये हवाएं ऐसा क्यूं कर रही थी...?

          क्या ये अपने बर्ताव से सबको सचेत करने भर तक था या फिर उसका बर्ताव भी किसी और बात पे टीका हुआ था ? उसका कभी-कभार सुकून देना , कभी-कभी टीस-सा चुभता क्यूं है...? ये हवाएं जो मुझे छुती है उसको मैं खोना नहीं चाहता क्योंकि सुकून यही है लेकिन पास रखना भी नहीं चाहता क्योंकि दर्द कभी-कभी मिलता भी है । 

                   इस कश्मकश को सुलझाने का तरीका है ये सवाल खुदसे पूछना कि , क्या ये हवाएं तुम्हारे भीतर जो सुखदुख को पैदा करती है उसमें सबसे बड़ा हिस्सा किस भाव का है ... !!! " ये हवाएं ना अपनी मर्जी से सुख दे रही और ना अपनी मर्जी से दुख . ये उसका बर्ताव है । इसके बावजूद भी तुम उसी जगह खड़े हो जिस जगह ये हवाएं बहती है तो यकीनन तुम्हारा उन फ़िजाओ , हवाओं के प्रति प्रेम गहरा है । "


       वो खिन्न जो हवाएं दे देती है वो तुम्हें या तो मजबूत बनाती है या फिर उसके जरिए ये नियति देखना चाहती है कि , " तुम्हारा प्रेम , तुम्हारा भाव महज एक आकर्षण है , खुशी का जरिए ही है या फिर वाकई उन फ़िजाओ - हवाओं को तुम आजाद देखके सुकून महसूस करते हो " । और फिर " वेद " को अपनी उलझनो का सुलझा हिस्सा मिल गया ...


      वेद जो एक ऐसे शहर आया हुआ था जहां लोग अपनी प्रतिभा , मेहनत और किस्मत के जरिए अफसर बनते है । उसकी चुनौतियों का पहला पढ़ाव असल में मंजिल तक पहुंचने के सफ़र का आखिरी पढ़ाव भी हो सकता था यदि वो उस पढ़ाव में दिमाग की बंदिशों और समाज के खौफ को खुदसे अलग रखकर जाता नहीं तो . 

और वो था  " प्रेम " . 

      वो प्रेम जो वो इसके पहले कर चुका था और जो इस दुनिया का ऐसा सच था जिसपर ये दुनिया टिकी भलई ना हो लेकिन सलीके से , सुकून से चल ज़रूर रही थी , हां ये बात एकतरफा ज़रूर है कि जब-जब आपसी प्रेम कमजोर पड़ता है तब-तब दुनिया में हिंसा होती है और इस "प्रेम" को आप लड़का - लड़की के प्रेम से अलग हटाके देखो तो वेद ये जानता था कि , ये प्रेम आजाद है क्योंकि वो हर किसीको ऊपर उठाता है ।


               कोई भी चीज या समाज तभी स्वतंत्र माना जाएगा , जब वो चीज या समाज खुदमें विकसित हो रहा हो , खुदकी प्रतिभा को बिना डर के निखारने में हाथ बटा रहा हो । 

    वेद की जिंदगी का दूजा प्रेम भी बिलकुल भोला प्रेम होने वाला था जिसमें उसको सहना पढ़ता , लड़ना पढ़ता अपने अंदर की घृणा से , ईर्ष्या से... वो अपने दोस्त समीर से कहता है 


वेद : प्रेम आज़ाद ना हो पाया तो मैं हार जाऊंगा...


समीर : कैसे भाई ...! अफसर बनने आया है , प्रेम करने नहीं


वेद : ये दोनों चीजें अलग नहीं है ... बल्कि प्रेम कभी आपको हराएगा नहीं और हरा दिया तो समझ लो तुमने जिससे भी प्रेम किया वो बस जुनून था , चाहत और खिंचाव था , प्रेम त्याग मांगता है वो चाहता है आप सामने वाले को अपना प्रेम सौंप दो बिना किसी ज़्यादा उम्मीदो के ...और ऐसा प्रेम करना खुदसे लड़ने के बराबर है


समीर ... चाहे आप मां-बाप , भाई- बहन या कोई लड़की से ही प्रेम करो... उनको आजाद नहीं कर पाए तो वो पंछी उड़ना भूल जाएगा...


समीर : फिर तुझे तो लड़ना होगा खुदसे, ये नामुमकिन है 


वेद : हां मुझे पता है ये मुमकिन नहीं...मै बस कोशिश कर सकता हूं


समीर : हम्म ...! , ये बंधन क्या महज नाम का है ...! असल में जब बंधन किसीसे होता है जिसे " संबंध " कहते है तो वो बंधन आजादी की ऊंचाइयों में होता चाहिए । यदि वो बंधन , आजाद ना हुआ तो " घुटन " बन जाएगा ।


वेद : हां , लेकिन हम इंसान है , आदर्श तो सभी तो पता होते है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं , लेकिन इसे अमल में लाना लगभग नामुमकिन हो जाता है क्योंकि आपको ये आदर्श अपनाने के लिए खुदको इस दुनिया की गंदगी से बचाना होता है और इस हुड में इंसान अपनी हर भावना को , गुस्से और ईर्ष्या को नियंत्रित करना पड़ता है जो मुश्किल काम है । ये मेरे लिए भी तो मुश्किल है ।


तभी समीर की बुआ सामने से आती हुई दिखी तो देव ने नमस्ते के लहज़े से सिर झुकाया तो बुआ ने दिल से आशीर्वाद दिया , उनके आते ही एक अनुभव हुआ जो अपनेपन का अहसास करता है । तब वेद ने कहा,


वेद : बुआ , क्या प्रेम ऐसा ही होता है जैसा आपके प्रति मेरा है और मेरे प्रति आपका ... आपके आने से जो अपनेपन का एहसास हुआ वो बंधन नहीं है प्रेम आजाद करता है और मांगता भी आजादी ही है पर ये करना मुश्किल क्यूं है ।


बुआ : वेद , मुश्किल तो हर एक चीज है लेकिन खुदको नियंत्रित करना वाकई बेहद मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं है । देखो वेद , चाहे कोई बात या पहलू नामुमकिन हो , तुम वो मत सोचो बस उसे अपनाओ और कोशिश करो । क्या , इसके अलावा कोई और तरीका है । 

           पानी की फितरत देखो , वो प्यास भी बुझाती है और तबाह भी करती है , वो अपनी चेतना को समझने के काबिल नहीं , ये हुनर कुदरत ने हम इंसानों को ही दिया है प्राणियों, जानवरों, जीवों को भी नहीं दिया । इनकी हरकते उनकी भावना पर पूरी तरह निर्भर है वो अपनी चेतना को नहीं समझ सकते और जो समझ सका , देखो उसी ने ये " सभ्यता " बनाई है । यदि आदिमानव सोचते कि ये नामुमकिन है तो क्या आज इतना विशाल तकनीकी विश्व होता । 


समीर : सही बात है , वेद तू बस वो कर जो तेरी भीतर की आवाज और सुकून कह रहा है । बाकी मुश्किल और सरल का पिंजरा छोड़ , अब प्रेम के साथ-साथ खुदकी सोच को भी आजाद कर । 


वेद : हां , यदि मैं खुदको अच्छा बनाए रखने में नाकाम रहा तो भी मै कोशिश करूंगा ताकि उतना बुरा ना हो जितना बुरा हो सकता है यदि मैं " अच्छा करने की कोशिश ना करूं " । 


**और अंत में वेद ने पहले अपने आप से प्रेम करना सिखा और फिर प्रेम का मतलब ...**


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