Kya Hum Aazad Hai ? | Indian Historical Philosophy on Freedom, Culture & Language
काश ! सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह जिंदा होते और महात्मा गाँधी की बात मानी जाती। सत्ता की अंधी खोखली लालच ने उस शुरुआती समय में भी ऐसे नेता राजनीति में गढ़े , जो अपनी प्राथमिकता निजी स्वार्थ और सत्ता बनाने में समझते रहे। संविधान की अगुआई से सत्ता में आने वाले लोग बड़ी चालाकी से संविधान का उल्लंघन् कर देते है।
क्या इसे हम कहेगें कि, हम आज़ाद है? आजादी क्या थी? दूसरे लोगो के आधीनता से हटके अपने लोगो के आधीन आ जाना? दूसरे बाहर के लोगो द्वारा शोषित और शासित होने के बजाए अपने लोगों से शोषित और शासित होना?
हाल ही में, आज़ादी का दूसरा पहलू भाषायी कट्टरता और विदेशी भाषा की प्रधानता से आज़ादी भी है। ये भाषा का अनोखा खेल जो राज्य को अलगाव में ले जा रहा है जो अनेकता में एकता के सर्वोच्य मूल्य को छती पहुँचा रहा है। क्या है भाषा का इतिहास? क्या ये एक प्रपंच है फिरसे गुलामी की ओर ले जाने का?
संविधान के प्रावधान और न्यायप्रियता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता क्युकी वो सही और समयानुरूप बदलते है। लेकिन जैसे चुनावी मौकों पर लोगो को गुमराह किया जाता है वैसे ही उसके उल्लंधन होने पर लोगो को गुमराह कर देते है इसे ही तो तीखी राजनीति कहते है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही है आज़ादी? क्या हम आज़ाद है? जंहा, अपनी मातृभाषा घर में स्वाभाविक रूप से बोलने में शर्म नहीं आती परंतु घर के बाहर विदेशी भाषा बोलके रौब झाड़ना और पढ़ा-लिखा साबित करना सम्मानजनक लगता है ।
अंग्रेज जब यह देश से गए तो पूरे निश्चिंत थे कि , " हम नहीं लेकिन हमारी सोच , सभ्यता और हर राष्ट्र की बुनियादी पहचान जो होती है अर्थात, भाषा के आधार से सौ साल और राज़ करेंगे।" हमारे देश की अच्छी बात है कि वह स्वयम से पहले दूसरे को स्थान देता है लेकिन यही अच्छाई उसके स्वाभिमान और बुद्धि को हर लेती है जिससे वह खुदको हीन एवम कमजोर और सामने वाले को विद्वान तथा सर्वोच्च मान चुका होता है। (आंबेडकरवाद )
ऐसे में वह सभी बहुमुल्य परिस्थितियों में खुदसे पहले दुसरो को रखता है। जैसे जातिव्यवस्था की बुनियादी स्थितियों में कारण रूप में देखा जा सकता है। इसे विद्वान समाजशास्त्री और राजनीतिज्ञ डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने "cast in India & there mechanism और जेनेसिस एंड डेवलोपमेन्ट (1917)" नामक अपने पहले प्रकाशन में विस्तार से वैज्ञानिक ढंग से दार्शनिक चिंतन व्यक्त किया है। जिसमें आप पायेंगे कि, जाति के आने और उसके गहनता से स्तर- दर- स्तर आप्त होने में इसी सोच का सर्वोच्च स्थान है जिससे लोग आज भी खुदकी मातृभाषा और सभ्यता को हीन और पश्चिमी सभ्यता और औपनिवेशिक भाषा को सर्वश्रेष्ठ समझते है। फिर हम इस क्षेत्र से गुलाम ही तो है। कहाँ आज़ाद है हम ! हमें आज़ाद होना होगा।
अन्य भाषाओं को सीखना, सभ्यता जानना गलत नहीं है लेकिन उसे खुदकी भावनात्मक भाषा से सर्वोच्च स्थान देना नासमझी और राष्ट्र को अंदर से खोखला कर देने की गम्भीर पहल है। इससे दार्शनिक ज्ञान और नैतिकता के प्रति ज्ञान का ह्रास होता है। आप सीखे और सिखाये, विनम्र रहें परंतु खुदकी सभ्यता पर आंच ना आने दे, यही राष्ट्रवाद है।
भारतीय समाज और उसकी रूपरेखा निर्धारित करने वाली राजव्यवस्था पर साहित्यिक वैचारिकता का प्रभाव गहनता से पड़ता है और वह विचारधारा यदि समाज की सभ्यता और आवश्यकता से सम्बन्ध नहीं रखने वाली हो तो देश के विकास के पैमाने का निर्धारण वही विचारधारा करेंगी जिससे राजव्यवस्था के निर्धारक और निदेशक प्रभावित है। और यकीनन यह सत्तारूढ़ निदेशक और कार्यवाहक , पश्चिमी सभ्यता और औद्योगिकी से आकर्षित होकर उसे ही सच्चा विकास मानने लगेंगे ।
स्वतन्त्रता के बाद भी वैचारिक आधार पर स्वतंत्रता नहीं मिल पायी । जो भारतीय समाज की, चाहें वह विविधताओ के चलते स्थानीय भाषा और संस्कृति में थोड़ी ही भिन्नता रखता हो , उस समाज की बुनियादी , नस्लीय और भौगोलिक-इतिहास से पैदा हुई स्वभाविक भावना अर्थात , मातृभाषा से बिल्कुल इतर विदेशी वैचारिकता का प्रभावकारी परिणाम है कि हम आज भी सोच से गुलाम है । इस पक्ष को समाजशास्त्र में गहनता से उकेरा गया है । और स्वाधीनता सेनानी और समाजसेवको ने भी आत्मीय बौद्धिकता का परिचय देते हुए सभ्यता - संस्कृति के अनुरुप जनसेवा और महत्वाकांक्षाओ को राजव्यवस्था के वैचारिकज्ञान का आधार माना है।
जैसे भगतसिंह , सुभाषचन्द्रबोस , डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गाँधी । यदि यह सभी स्वतन्त्रता के दिनों में जीवित होते तो औपनिवेशिक वैचारिकता और मुख्यत: शासितभाषा का इतना प्रभावशाली परिणाम आज देखने नहीं मिलता । क्युकी उनके बदलाव क्रूर राजनीति और सत्तामोह से परे समाजसेवा और स्थानीय सभ्यता की नैतिक प्रगति को केंद्र में रखकर होते । स्वतन्त्रता पश्चात भी ऐसे राजनेता भी हुए है जिन्होंने समाजसुधार की सच्ची भावना को पहचान कर देश को नई दिशा देने का प्रयत्न किया।
गाँधी गीता को मानते थे । वह खुदको गीता के विचारों का सार्थक मानते थे । इसीलिए वह भारत को एक धर्म के भीतर कट्टर रूप में जकड़े नहीं देख सकते थे। वो आत्मीय धर्म को मानते थे जो मानव को धर्म में बाटकर उसके साथ सही-गलत करने का निर्णय नहीं करती बल्कि मानव को मानव समझकर उसे पूजती है।
अत: समाज को उसके आत्मीय स्वभाव से हटाकर नवीन तकनीकि - वैज्ञानिक और औद्योगिक सभ्यता* की ओर ले जाना राजनीति में नेताओं की स्वार्थपरक नीतियो का परिणाम है। इसको निष्कर्षत: संविधानसभा की बैठक में डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने कहा था कि , " संविधान कितना भी खराब क्यूँ ना हो यदि उसे चलाने वाले बौद्धिक और सच्चेसेवक है तो संविधान का भावार्थ सार्थक हो जायेगा। परंतु संविधान कितना भी अच्छा क्यूँ ना हो उसके संरक्षक भ्रष्ट , लोभी है तो संविधान किसी भी परिस्थितियों में सार्थक सिध्द नहीं हो सकता है। " स्पष्टत: संवैधानिकता के साथ महत्वपूर्ण स्थिति उस विचारधारा की होती है जो स्थानीय सभ्यता - संस्कृति और कल्याण के मद्देनज़र हो , ना की उस विचारधारा या समावेशी विचारधारा की जो समाज की आवश्यकता को वैज्ञानिक और नैतिक दिशा देने के बजाय उसपर आवश्यकता थोप देती है जो औद्योगिकीकरण और भू-मंडलीकरण ( दशक : 1990 ) के विख्यात का परिणाम है।
~ वैचारिकता का परिणाम
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