“True Gender Equality: Feminine & Masculine Energy Explained (Psychology, Philosophy & Modern Society”

 

Gender philosophy



नारी या पुरुष , दोनों का अस्तित्व किससे जुड़ा हुआ है ! जो जिस भाषा को जन्म देते है वो गुलामी की जंजीरों में जकडे हुए है या आजाद है ? उन असहायों की तरह जो खुदको पंख देने में कामयाब हो पाई! बावजूद इसके कि , चारो तरफ पंख कुतरने वाले गीदड़ मौजूद थे । 


१) नारी का अस्तित्व : जब नारियां शिक्षित हो जाती है तो समाज में समानता आती है परन्तु शिक्षित होना ही काफी नही है "लैंगिक असमानता" के भेद को दूर करने के लिए , व्यक्तित्व का निर्माण करना बेहद ज़रूरी है...

       "एक होती है वो नारी जो केवल शिक्षित होती है और एक होती है वो नारी जो व्यक्तित्व का निर्माण कर विकसित , प्रगतिशील होती है . "

        नारी-नारी पर भारी होती है परंतु वे नारी जिसका व्यक्तित्व बन गया है या बन रहा है , वो कतई नारी पर भारी नही हो सकती और ऐसी नारी भीड़ में चीखने चिल्लाने के बजाय शांत रहकर टाल देना शांति स्थापित करने हेतु ज़रूरी समझती है ।

      परिस्थितियाँ प्राचीन काल से ही ऐसी बनी है कि महिला दिवस बनाने की ज़रूरत आन पड़ी , यह नही आती यदि "नैतिक समाज" नारी को मनुष्य समझता , सामान नही. 

    क्या खूब कहा था किसी प्रसिद्ध महिला ने कि , कोशिश यह भी रहे कि "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" की बजाय "अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस" मनाना न पड़े.

       समानता , अधीकार , कर्तव्य और आवश्यकता / ज़रूरत की इन नैतिक सामाजिक उलझनों में समानता की नही अपितु आवश्यकता की ज़रूरत है ।     

       एक नारी बड़ी गहराई से महसूस कर सकती है कि जीवन में उसने क्या-क्या दर्द सहे हैं , कँहा-कँहा ज़लील हुई है , क्या-क्या और किस-किस तरह से ख़ुदको शारिरिक तौर पर असुविधाजनक महसूस की है , किन-किन लोगों ने उसको उसकी औकात दिखाने की कोशिश की है और कब-कब उस नारी ने ख़ुदको अकेला महसूस किया है , कैसे-कैसे उसने साहस - हिम्मत से काम लिया है । 

     अभिवृति होना ज़रूरी है पर उसका सही जगह , सही तरीके से उपयोग करते रहना और उसमें "घमण्ड या सेल्फ ईगो" को न आने देना बेहद ज़रूरी है तब जब आस-पास की ही नहीं अपितु विश्व की परिस्थितियाँ भी नारी की विषम स्थिती को गहन अमूर्त रूप से ज़ाहिर करती रही हैं ।     

        नारी की प्रत्येक आर्थिक , राजनैतिक , धार्मिक , सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रो में स्थितियां ऐसी रही है कि उनको पुरूष समाज ने समानता , स्वतन्त्रता नही दी और परिणामस्वरूप आज भी , भलई पहले की अपेक्षा कम पर काफी सीमा तक , यह मौलिकता नही मिल पायी है , यह इसीलिय नही कि , "आँकड़े और रिसर्च" ऐसा कहता है , यह इसलिये क्योंकि यह आज भी देखा जाता है और महसूस भी किया जाता है , 

        बस उसको देखने वाली नज़र खुद नारी की हो सकती है , यदि वो आँखे पुरुष की है तो उस पुरुष को मेरा सह-ह्रदय से नमन... 

      बात स्थितियों की हुई , परन्तु बात व्यक्तित्व निर्माण की कि जाये तो... हम पाते है कि , नारियों को शिक्षित होने के साथ-साथ स्वयं को सशक्त , साहसी , निडर , हिम्मती और वैज्ञानिक बौद्धिकता से युक्त शारीरिक क्षमता में प्रगतिवान बनाने का भी प्रयास करना चाहिए । और समाज में अलग पहचान के लिए , साथ ही स्वयं को आधुनिकता में ढालने के लिए, अपने व्यक्तित्व को बनाना और दृणतापूर्वक उसे बनाए रखना , "लैंगिक समानता और मौलिक सामाजिक विकास" हेतु ज़रूरी है ।


२) पुरुष का अस्तित्व: 


"ऐसा नहीं है कि नारियों की समस्याओं के बीच पुरुषों की असमंजसता को नजरअंदाज किया जा रहा है" ,    

            उनका जीवन , जिम्मेदारियों से लदा हुआ है और कठिनाईयाँ उनके जीवन में भी आती है जिनको दूर करना और समाधान हेतु चिंतन करना आवश्यक है ;         

        परन्तु प्राचीन पुरुषप्रधान (वैदिक) काल से ही उनकी समस्याओं की सीमा उतनी व्यापक और दयनीय नहीं रही जितनी भयावह स्थितियाँ महिलाओं की जिंदगी में लायी गयी है , जिसको देखते हुए नारियों की समस्याओं पर अध्ययन करना सर्वोपरि कर्तव्य बन जाता है , जिसकी चर्चा आज का विषय था .

      जहां तक बात पुरुष की वर्तमान स्थिति की है , आध्यात्म में आत्मा के स्तर पर वे feminine energy / स्त्रीत्व ऊर्जा को लिए हुए होते है और महिला उसी आत्म स्तर पर musculine energy / पुरुषत्व ऊर्जा को ली हुई होती है जो साहस, तर्क और आत्मविश्वास से भरा होता है जिसके आत्मा से शरीर द्वारा बाहर ना आने की चेष्ठा " ये सामाजिक रूढ़िवादिता " करती है वही ये पुरुषप्रधान समाज और प्राचीन रूढ़ियां पुरुषों के अंदर की फेमिनिन ऊर्जा या ममता को बाहर आने से रोकते है जिससे पुरुषों का रोना भी " कमजोरी की निशानी और बेवजह कमाई करना मजबूती का प्रतीक " बन जाता है ।

    यहां स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने आत्मा की सच्चाई से भागते है उसे अपनाने पर जो सुकून वो महसूस करते है वो ही उनकी असली " आजादी " होती है जिससे यह रूढ़िया डरती है क्योंकि इनके बनाए नियम-धर्म अस्वीकार होने पर इनके अहम के अस्तित्व को ठेस पहुंचती है । तब या तो ये नारी - पुरुष के अस्तित्व की चिंता करे या अपने गड़े हुए नियम - धर्म के अस्तित्व की । जिसे "संस्कृतिकरण " कहा जाता है ।

      जहां बात है ज़रूरत और जागरूक करने की है तथा उसे (पुरुषों एवं महिलाओं द्वारा) अपने अंतिम सांस तक निष्पक्ष रूप से अपनाने की है , न कि " समानता और आवश्यक " में से समानता को , आधुनिक विपरीत स्थितियों की परख किये बिना , अपनी पसंद बना लेना है । 

     अधिकार समान हो , सम्मान समान हो , पुरुष-महिला बराबर है उनका दायर बराबर हो ; यह उचित है परंतु जो लंबे समय से होता आया है उसको समान स्तर में लाने और "जो हुआ है वो न हो" , ऐसा प्रयास करने के लिए जागरूकता अभियान आयोजित करना और इसपे सकारात्मक रूप से सोचकर एक निश्चित आयाम में पहुँचना बेहद ज़रूरी है , 

    अतः समानता से पूर्व ज़रूरत पर चिंतन करना आवश्यक है । आपवादिक बुराइयों (चाहे पुरूष वर्ग हो या महिला वर्ग) का आज की परिस्थितियों के अनुसार , नारियों द्वारा डटकर सामना करना प्रगतिशील और प्रत्येक पक्षो में विकास करने हेतु अत्यंत आवश्यक है । 


धन्यवाद... 

Youtube 📷  : Indiandarshiki 



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1) what is feminine and masculine energy in psychology


2) how Carl Jung explained anima and animus


3) philosophical approach to gender equality


4) why true feminism must include men


5) spiritual balance between masculine and feminine


6) how upbringing shapes gender psychology


7) difference between empowerment and domination


8) why both genders suffer in society


9) psychological healing for men and women


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