SOMRAL The Inner Road : Philosophical Story " Ek Darshan Ek Safar " अंदर का रास्ता एक दर्शन है



एक थकी हुई आवाज लिए आप सफर पे चलते है एक ऐसा सफर जिसकी मंजिल धुंधली है और वो कोहरापन आपको कई विचारों के सैलाब में ले जाता है ये सैलाब मंजिल के धुंधलेपन को और गहराई-से धुंधली करती है लेकिन मन की , इस चालाक दिमाग की फड़फड़ाहट कम करने का मकाम नज़र नहीं आता । 

                         🫥 ये मन की उलझने जितना सुलझाऊ उतना उलझ जाती है। इसका कोई आकार नहीं दिखता , ये खामोश मन में शांत लहर जैसी हो जाती है जिसको ना अब जाने पहचाने कल का पता और ना अंजानकल की फ़िक्र। 

                              🫥इस मंजिल के ख्वाबगान का अता-पता नहीं पता लेकिन एक चीज थी जो , सोमरल के दिमाग में थी ( सोमरल, एक युवा ) ।

       इसके पहले वो उसे आजमाता वो अपने रोजमर्रा की जिंदगी में खुदको लगाके अपना काम करने लगा । वो काम जो उसका था लेकिन पूरी तरह नहीं था , जो उसकी जिंदगी का हिस्सा था लेकिन रूह का नहीं था । और यही वो कड़ी थी जो सोमरल के दिमाग में अटकी थी । वो काफी पीके , शाम को टहलते हुए रास्ते को अंतिम छोर तक आ पहुंचा । जहां उसको अंधेरा दिखा लेकिन उजाले की बनावटी रौशनी वहां नहीं थी । उसके सामने एक युवा आया और कहा, 


सोमरल तुम यहां कैसे ? 

🫥सोमरल : तुम कौन हो? 

🕊️युवा : मैं , सोमरल 

🫥सोमरल : क्या मजाक है , मै हूं सोमरल । तुम कौन हो और तुम्हारी शक्ल क्यूं नहीं है , तुम काले से क्यूं हो , सामने आओ । 


🕊️युवा : मैं, सोमरल ही हूं , तुमसे ज्यादा असली सोमरल। तुम ये बताओ । तुम यहां कैसे , ये जगह अंधेरी सी है और इस अंधेरे में तुम खो जाऊंगे। ये सन्नाटा तुम्हे शून्य बना सकता है ।


🫥सोमरल : तुम जो भी हो लेकिन इतना सुनो , मै ही हकीकत हूं और मेरा होना इस बात का सबूत है कि मैं ही असली हूं और मैं सन्नाटे से डरता नहीं। तुम इस शोर को सन्नाटा कहते हो , वाह ! ये तेज हवा और मन की आहटे नहीं महसूस होती । ये सन्नाटा नहीं शोर है।


🕊️युवा : शोर मन की एक स्थिति है यदि वो तुम्हे भटका रही है तो वो शोर है और वो तुम्हे नहीं भटका रही तो वो शोर नहीं है चाहे उसके शब्द - आहटे किसी और को कितना भी उलझाए । इसलिए मैं ही सोमरल हूं क्योंकि मुझे इस आकारी दुनिया की आवाजों को महसूस करने में झटपटाहट महसूस नहीं होती ।


🫥सोमरल : मेरे विचारों की दरी फैल रही है और उनमें तुम महज एक धूलसे हो ।


Blog : Part 2 : SOMRAL : The Inner Road 


🕊️युवा : तुम्हारे विचारों से उगा हुआ बीज ही हूं मैं जिसे तुम धूल समझ रहे , वो तुम्हारी अंदर की सोच है और वहीं सोच हूं मैं , तुम इस बनावटी दुनिया के नियमों में ऐसे बंधे कि उसकी धूल में खुद ही लिपट गए , तुम तो पक्के सुकरात निकले । बाहर देखो खुदके , इस जाल को समझो जो प्रशासन व्यवस्था के जरिए तुम्हारे भीतर जम रही है । ये जमावड़ा आघात है तुम्हारा । इसे पहचानो ।


⭐"सोमरल खामोशी से उस अंधेरी गलियों में चल दिया जहां उसकी रौशनी खोईसी थी और बस अंदर का सोमरल ही था जो उसको इस बनी हुई दुनिया को और बनाने से पहले खुदको बनाने की बात कर रह था" 


🪔इतने में कुछ युवासंघ हाथों में मशाल लिए इस अंधेरी कोठरी से गलियों से जा रहे थे , इस रौशनी में भी अंधेरा डर बनके सहमाया हुआ सा था , और सोमरल ने सुना , 


🪔युवासंघ : हमारे ऊपर थोपा गया है ये जाल , ये जाल हमें जीने नहीं दे रहा और गुलाम बना रहा और उपभोगी बना रहा , ये गुलामी है गुलामी । अंग्रेजों की गुलामी से निकलके ऐसी गुलामी में आ गए जहां गुलामी को सफेद पर्दे से ढक्के ये सरकार फिल्म दिखाती है और उस फिल्म में फायदा लोकतंत्र का होगा या फिर राजतंत्र का । हमें रोजगार दो रोजगार ।


🕊️सोमरल से युवा ने बोला : देखो , ये है देश जहां तकनीकी, कारखाने और महंगे कपड़े औजारों से पूरे लोकतंत्र को व्यस्त रखा जाता है । और इसे पाना और ज्यादा ऊंची नाक करना ही अब सबका धर्म बन गया है , इसमें ये नाकाम हुए तो यही समाज जिसे संस्कृतिकरण के नाम पे तो कभी व्यापार पैसे और संसाधनों को और खाते रहने के नाम पे गुलाम बनाया गया यही तुम्हे जीने नहीं देंगी । 


🫥सोमरल : तो समस्या ये है कि मैं इन आर्थिक सामाजिक पैटर्न को बना नहीं पा रहा इससे परेशान हूं तो कभी इस बात से कि मैं वो नहीं कर पा रहा जो मैं हकीकत में हूं ।


🕊️युवा : हां , तुम बनाए गए नियमों को बनाने में लगे हो और वो नियम का क्या जो तुम्हे बनाना चाहता है । जो तुम्हारे ज्ञान को मुक्ति का रास्ता दिखा जायेगा । 

             🫥" इन शोर को सुनो जो भीतर ही भीतर लहराते हुए तुम्हे कहती है कि तुम कौन हो ! " , ये अंदर का सोमरल और बाहर के सोमरल में क्या फर्क है । ये फर्क हो है जो तुम्हे तरंगों से मिलाएगी , तुम्हे उजाले का ख्वाब दिखाएगी । खुदका सोचना मतलबी होना तभी माना जाएगा जब तुम दूसरों को या समाज को तकलीफ दो और तब भी काला साया माना जाएगा जब तुम इससे खुदको ही खत्म कर दो । 

                  🫥खुदको इन तकनीकियों का गुलाम बनने से रोको और लालसा ना रोक पाए तो ये सोचो कि तुम गरीब हो और गरीब के पास ना मोबाइल है और ना ही उसकी खोखली यादें । ये यादें जो इस नेटवर्क ने अपने भीतर ऐसे जमाई है जैसे ये ही तुम्हे परमसुख देगी । ये वस्तु है खिलौना जो तुम्हे बनाने में काम आएगा लेकिन ये अपने आप में सुख नहीं है ये याद रखना । वैसे ही जैसे ये समाज में तुम बस एक काम के आदमी हो बस काम के आदमी । 


🫥सोमरल : हां , मै समाज , राज्य में महज एक काम का आदमी हूं जो मेरा काम है । मै अपने आप के लिए अपने आप में एक नियम हूं एक साम्राज्य हूं। मेरा सबसे बड़ा काम ये है कि मैं खुदको बचाकर रखूं। इस वैश्विक व्यापार की गुलामी से , इस कॉरपोरेट जगत की हामी से । इस ना दिखने वाले हाथों की गुलामी से ।

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सोमरल अब उस अंधेरे से बाहर जा रहा था जो उसके कशमकश की पैदाइशों में उभर रही थी जो उसको एक ना दिखने वाली गुलामी में दफना रही थी , ये आवाज जो उसके भीतर थी वो इस दुख की छांव में ही दिख सकती थी । 

                             दुख महज एक रास्ता है सुख के दायरे को छोटा करने का । ये दायरा हमें तब मिलता है जब सोमरल की तरह हर शख़्स इस बनावटी दुनिया के चाल को समझ सके , जो इससे भी पहले खुदकी लालसा , मोह को समझ सके । ये दायरा इतना छोटा होता है कि इंसान से निवाला छीनने पे भी वो ज्यादा देर दुखी नहीं हो सकता , वो होगा तो शांत वैसे ही जैसे एक किनारे से लगा रास्ता शांत होता है जो दिखाता है मंजिल आपको । बस चुनना ये होता है कि आपका रास्ता , किसी और के रास्ते से अलग है।

          ✨एक खामोशी होती है जो कयामत के रास्ते से आती है और वो चुभने से पहले हौले-हौले नजदीक से सरकती है ताकि तुममें समा जाने से पहले तुमको परख सके कि ये खामोशी संभालने की क़ुबत तुममें है या नहीं । यदि नहीं है तो वो दरवाजा खटखटाके चली जाएगी क्योंकि आप दरवाजा खोलेंगे ही नहीं क्योंकि आप खामोशी की दस्तक से डर जाते रहे होगे । और उस डर से शोर में छुपने के अलावा रास्ता नहीं होगा ।

      

          ✨सोमरल ने दरवाज़ा खोला था और खामोशी का स्वागत उसने फूलों की लड़ियों से किया , उसके सुगंध और गंध दोनों को अपने नसों की तिरोहियों में पिरोया था उसने , तब चुनी थी कायनात ने उसकी सख्ती । जिसे वो अब और परखने वाला था । और खामोशी खामोश होके सोमरल के माथे के पसीने को फूंककर उसके अंत:प्रज्ञा में खो जाने वाली थी जैसे आसमान से वास्ता रखके कोई रौशनी की एक कुंज , जादुई तरीकों से किसी पत्थर में जान डाल रही हो। 


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