" KYU/WHY? " / ASK YOURSELF - THE PHILOSOPHICAL HISTORY SystemAurSamaj Mujhse Kya Chahta hai ? | बुर्जुआ vs सर्वहारा | Bourgeoisie and proletariat



एक बात जो गहरी 'हो सकती है : फैसला करना सीखे वरना आप भी अपाहिज कहलाएगे जो दिखाई नहीं देंगी लेकिन गंध महसूस होगी जरूर । 

      क्या तय किया जाता है जब आप उन आयामों में ढल नहीं पाते जो समाज या सिस्टम ने बनाए हुए है इसलिए नहीं कि आपमें क़ूबत नहीं है . बल्कि इसलिए नहीं सफल हो पाते क्योंकि उनको प्रतिभा का रस नहीं , हां-में-हां मिलाने वाला पुतला चाहिए । जो सच्चा पत्रकार, वकील या कलेक्टर ना हो बल्कि वो हो जो गलत को सही ठहराने में गलत का साथ सही तरीके से दे...

         नीत्शे के विचार भी थे कि , सफ़लता समाज के नजरिए पर तय होती है जहां सिस्टम उसे लेबल दे ।  

            क्या सही माना जाए और क्या नहीं ये बात भी चालाकी से आज तक एग्जाम पेपर में सवाल के तालीमात पूछा जाता है। यदि आपने जवाब में सिस्टम के खिलाफ जवाब पेश फरमाया तो वो आपको चुनेगा ही क्यूं ! अब आप इस दफ़ा खुदसे पूछेंगे कि " मैं पास क्यूं नहीं हुआ , मैने तो सही टिक मारा , शायद मुझमें क़ूबत नहीं " ।

पर जनाब थोड़ा चुनाव प्रक्रिया को समझो तो ज़रा , सिस्टम आपसे सच नहीं जानना चाहता वो बस वहीं जानना चाहता है जो उनकी बनाई हुई व्यवस्था में सटीक रूप से बैठता हो । ये एक ऐसा सच है जो दशकों पहली गंभीर सवाल था जो अब अति गंभीर हो गया है । पहले सवाल सही-गलत को देखके वाद विवाद के तरीके से पूछे जाते थे ,  लेकिन थोड़ा मोड़ा हुआ रास्ता है आज इस आधुनिक दुनिया का कि यहां , सवाल पूछने वाले को अपाहिज बनाया गया , या तो शरीर से या फिर आत्मा से । 

     लेकिन क्यूं? सफलता आज कल सिस्टम द्वारा तय पुरस्कार या समाज की भीड़ द्वारा तय लेबल क्यूं बन गया है ? क्या वहाज हो सकती है कि रास्ते में बिखरे धूल को लोग चाटेंगे यदि कैमरा ऑन हो जाए । और उसी धूल को साफ भी करेंगे यदि सिस्टम उसे नीति में लिख दे। बात यहां सिस्टम की व्यवस्था के खिलाफ नहीं कही जा रही । बात बस ये है कि आज कल लोग न्याय को समाज की भीड़ और सिस्टम की राजनीति के ठप्पे से जोड़ रहे है । लोग खुदसे चिंतनमनन करना ही बंद कर रहे है । लोगों की क्रिटिकल थिंकिंग यानी कि चेतना ही कमजोर हो गई है क्योंकि वह महज देह को यानी कि शरीर को यानी कि मोह को यानी कि फेम को अपनी आधुनिकता और  स्वतंत्रता मानकर सही ठहरा रहे है । उनके लिए दो पल की खुशी वैध है क्योंकि नैतिकता स्वतंत्रता है । 

         कोई इन्हें बताए सार्त्र ने क्या कहा था कि आजादी चाहिए तो मशीनों को गुलाम बनाओ ना कि उसे पाने को ही अपनी जिंदगी का एक मात्र लक्ष्य। और सही मायने में आज़ाद वही है सुधारता है सीखता है और " सोचता है " । जो सोच ही नहीं सकता वो दिमाग से अपाहिज है और गोल कमरे में अपाहिजो की भीड़ ज्यादा हो तो , ठीक-ठाक दिमाग वाला पैरों से लंगड़ा इंसान हाशिया हो जाता है और यही अपाहिज इनपे हंसते है । क्यूं? क्योंकि देखो तो ज़रा इसे " कमरे में सारे लोग हम दिमाग से अपाहिजो जैसे है और ये साहबजादे जो शरीर से अपाहिज है हमें ज्ञान दे रहे " । 

                फिर क्या बुद्धि से अपाहिजो कि ज्यादा संख्या होने से वो बुर्जुआ बनके बलखाएंगे कि देखो " हम शरीर है शरीर मोहित , रोमांचित है और यही सत्य है " । 


सत्य मुझे या आपको ही तय करना है , और ये तय तब होगा जब आप खुदको शरीर नहीं आत्मा समझेंगे । सही को सही और गलत को गलत कहने की " हिम्मत " रखेंगे और नहीं रख पाए तो मान ले कि आप " गुलाम " है और चुपचाप हाशिए में जाके लाइन में खड़े रहे और दुआ करे कि जो " हिम्मत दिखाके खुदसे फैसले कर रहा है " वह सफल लो । हां ये सफलता आपको समाज या सिस्टम नहीं दे सकता , यह वो सफलता है जो समाज और सिस्टम के द्वारा सम्मानित स्थिर खड़ी बिचारी भीड़ को चिड़ा सकती है । क्यूं? क्योंकि वो , " क्यूं " नहीं पूछते , ना खुदसे और ना ही समाज - सिस्टम से । 

क्यूं? क्यूं? क्यूं? 

कोई कहे : ये दुनिया ऐसी ही चली आ रही है ...

आप पूछो : क्यूं? क्यूं है ? आखिरकार क्यूं है ?

कोई पुछे तुम अकेले हो , इसे नहीं बदल सकते ...

आप पूछो : क्यूं? क्यूं नहीं बदल सकता ? आखिरकार क्यूं?

कोई कहे : ये रीत है ऐसा हो होता आया है ...

आप पूछो : क्यूं? क्यूं होता आया है ? और ऐसा है तो देश आज़ाद कैसे हुआ ? कैसे औरतों को अधिकार मिले ? कैसे आज हिंदुस्तान में सभी धर्म के लोगों के अधिकार सुरक्षित रखे जाएंगे, का वादा होता है ? यदि रीत है तो ये बदलाव कैसे? किसीने तो पहल की होगी तभी तो दहेज में औरतों को जलाया नहीं गया । 

कोई कहे : वो तो हो गया बस , तुम नहीं कर सकते ...

आप पूछो : क्यूं? और हां मैं नहीं कर सकता , तुम सही हो , लेकिन बता दो , कुछ ना करके क्या मिलेगा ? क्या आत्मा मेरी शांत हो पाएगी ?

कोई कहे : तुम आम नागरिक हो ...

आप पूछो : क्यूं? भाई-साहब आम नागरिक हूं इसलिए "क्यूं" पूछ हूं । सबसे पहले मेरा शरीर आया फिर चेतना लेकिन ये पहली दफा आई वस्तु यानी कि शरीर कुछ सालों बाद मुर्झा जाएगी , चेतना ही है जो अंत तक जवान और जवान बनी रहेगी । 

सवाल वही पूछा जाता है जो बनाए हुए सिस्टम - समाज के दायरे में रहती हो , जो सचके आज़ाद हो वो जीते जी सफल नहीं हो पाता । सच सबको पता है बस दिमाग से अपाहिज मानना नहीं चाहते और पैरों से ज़रा अपाहिज हारना नहीं चाहते ।


फैसला करना सीखे वरना आप भी अपाहिज कहलाएगे जो दिखाई नहीं देंगी लेकिन गंध महसूस होगी जरूर ।




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