Adjustment from Sovereignity | Freedom & Justice : The Philosophy of Sovereignity | Immanuel Kant by Indiandarshiki




क्या किसी देश को ये हक नहीं है कि वो अपनी विदेश नीतियों को अपनी आंतरिक सहूलियत के हिसाब से ढाल सके और तकनीकी संरचना और सुरक्षा इतनी जरूरी है कि बजट में आधा हिस्सा बस सुरक्षा और औद्योगिक विकास के फंड रूप में ही हो ! क्या इससे जरूरी वो मुद्दे नहीं है जो आंतरिक स्वतंत्रता को दर्शाते है यानी कि " स्वास्थ्य, शिक्षा व्यवस्था और खुशहाली , भुखमरी " । 

     कागजों में आंकड़े रटने से प्रशासन मिल जाएगा लेकिन क्या इंसानियत इतनी कमजोर है कि वो आंकड़ों की कागजी सच्चाई को देख ही ना पाए ? क्या हमारी बाहरी आंखे , हमारी अंदर की आंखों को नजरअंदाज करती है ?


पश्चिमी एशिया सहित हिंद-प्रशांत क्षेत्र प्राकृतिक तेल संसाधनों, धातुओं और परमाणु ऊर्जा संसाधनों के साथ-साथ एक अलग धार्मिक-दार्शनिक विरासत भी रखता है, जो विचारधारा की पूर्व-पश्चिम की लड़ाई में इस क्षेत्र को खासा आत्मनिर्भर और गरिमामय बना देता है। इसका बेहतरीन उदाहरण है यूनानी-अरब प्रदेशों का कम तकनीकी उपलब्धता के बावजूद मजबूत आर्थिक आत्मनिर्भर बनना। श्रमशक्ति और एकता के आदर्शवादी निर्णायकों के चलते, यह क्षेत्र 1990 के दशकों में रूस-अमेरिकी विचारधारा के आपसी संघर्षों के बीच पिसने के बावजूद, आंतरिक ऐतिहासिक शक्ति के विरासत के दम पर अपनी पहचान बनाने में सफल हुआ। 

                                                        जिस कारण अमेरिका जानता है कि पश्चिमी एशिया, जैसे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई इरान, सीरिया, गाज़ा पर नियंत्रण हेतु रक्षा तकनीक का व्यापार करना कितना ज़रूरी है, क्योंकि वाणिज्यिक समझौता महज़ आपसी लाभ तक सीमित नहीं होता। यह व्यापार का खुलापन पूंजीवाद को पोषित करते रहने की दस्तक भी होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप में अमेरिकी प्रभुत्व को बनाए रखने का ज़रिया है। यह रक्षा समझौता देश की आंतरिक सुरक्षा की ज़रूरत तो है ही, लेकिन यह निर्भरता की दिशा में कदम भी है, क्योंकि यहाँ खरीदार-विक्रेता पर निर्भर रहकर अपनी विदेशी आर्थिक तकनीकों की उसी अनुरूप ढलने पर विवश हो जाएगा। क्योंकि समझौता करता को यह समझौता मुख्य रूप से अपनी पड़ोसी देशों से सुरक्षा के तौर पर करना होगा, जिस कारण यहाँ तो भारत आत्मनिर्भर हो जाए, जैसे चीन, रूस और अमेरिका हैं, या तो पड़ोसी देशों से खिचतान के चलते अप्रत्यक्ष-अनौपचारिक तौर पर महाशक्तियों के किसी खेमे में ढल जाए।

Russia once stood with India. But what happens when global “protection doctrines” start shaping how nations should behave?

• When does security become silent control?

• When does help become influence?

• Monroe Doctrine then. Strategic pressure now.

• Is sovereignty really safe in today’s world order? 

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