CHAPTER's : Ek Darshan Ek Kavita : Philosophical Thoughts Based on Life & Social Affairs

Chapter 1 : दो धारा 

हर एक पैदाइश अलग फितरत लेती है और उनकी सोचने की धारा भी अलग होती है । अब उसकी धारा की दिशा कोई और व्यक्तित्व वाली धारा तय करने लगे तो वो धारा जो अपने हिसाब से बह रहा था मेरी बारीक नजर कहती है कि वही धारा , दूजी आकर्षक तेज धारा के बहाव में बहती नजर आएगी फिर वो अपनी सोच खो देगी और किसी और की सोच को इसलिए अपनाएगी क्योंकि वो ज्यादा सजाया हुआ और दिमाग को सरल लगने वाला लगता है । 

क्या मूर्खता है , विद्वान ने सोच पे भी सोचा इसलिए वहां तक पहुंचे और आप सोचते है कि आप जिंदगी को वैसे ही जिए जैसी वो है क्योंकि आप दिमाग से पैदल होना स्वीकार कर चुके है । आप या तो घबराते है सोचने से या फिर क्रिएटिविटी ही धुंधली हो गई है और भयानक बात यह है कि इन आम लोगों को पता ही नहीं कि अब इन्हें आम बनाए रखने की चेष्टा हो रही है जबकि वो खास हो सकते थे । 

आप तेज धारा में हाथ धोए लेकिन उसमें डूब जाऊंगे तो अपनी पहचान खो दोगे और सही - गलत का फैसला ही किसी और की सोच पे निर्भर होगा ।

Chapter 2 : अपाहिज मन की कूटनीति 

कितनी बेबसी होगी वो दरमिया सिसकियों की जब अंधेरी में भी उजाले की एक हल्की किरण की उम्मीद हो , ना जाने कैसे एक भोला इंसान खुदको भोला कहके धोखे खाता और सिसकिया लेके चुप हो जाता है इस भोले की बेबसी तो देखो वो महज शतरंज में सैनिक भी ना बन सका और मारा फिरता तकदीर के । 

अरे अक्ल से हल्के , जमाने की जाल साजी बुद्धि से भी नहीं निकलती वो तो मन की चंचलता होती है जो मन की अपाहिजो को खून में भी अमृत और रूह में भी खुदगर्जी दिखाई पड़ती है । यह जमाना तकरीबन तुम्हारे लफ्जों का खेल है लेकिन भोले इंसान तुम्हे क्यूं गुरूर है उस शख्सियत पर , जो जमाने में ठुकरा दिए जाने का कारण बनता है ।

कूटनीति में सब सही है जो आपके अहम और अस्तित्व के लिए सही है तो भोले इंसान तू इस जमाने में गिरने के काबिल है यदि तूने अपने ईमान को बिना बेचे इन नकली चेहरों की आंखों को रौंध दिया तो मेरे रूह कहती है तेरे अंदर इस गंदी भरी दुनिया में साफ कपड़े में जीने की कला आ ही जाएगी तो क्यूं ना तू आंसू पोछे और अंदर के शेर को जगा के रखे क्योंकि महादेव भोले है लेकिन तांडव भी वही करते है 

  Chapter 3 : स्त्री होना चाहती हूं मैं

" स्त्री होना चाहती हूं मैं ." इस बात का ख्याल मुझे तब आया जब मैंने अपने आप को आइने में देखा और सोचा " खूबसूरत हूं मैं और क्यूं ना इस खूबसूरती को मैं निखारु - सवारु, इसे पुरुष जैसा बेजान ना बनने दूं " तब सोचा कि हां स्त्री होना वाकई सुलभ होगा यदि पूरब और पश्चिम की स्त्रियों की भीड़ की दौड़ से ऊपर उठके मैं बस " स्त्री / नारी " बनना सीखूं , अपनी अस्मिता और अस्तित्व को ध्यान में रखके कि कोई ये ना कह दे " तुम दासी , स्वामी कहां है " । स्वामी!

स्वामी ... तो क्यूं ना मैं खुद अपनी ईर्ष्या और घृणा की स्वामिनी बन जाऊ । उस मोह को अपनी अक्ल का दास बना दूं जो जगह जगह घूमता है सरफिरा है लावारिस है और स्त्री को " स्त्री " होने से रोकता है । ये बस बाते लग रही होगी लेकिन सत्य की पीढ़ा पे बैठा एक ऐसा सच है यह जो समाज के दायरे में पूरी पृथ्वी तक फैला है क्योंकि विश्व के किसी ग्रह में क्या बता कोई दुनिया हो जो स्त्री को स्त्री होने से रोकती ना हो , क्या पता वो पुरुष को सीखना चाहती हो , क्या पता कोई तो ग्रंथ मिले जो स्त्री ने लिखे हो । सलाम है उन्हें जो सेनानी बनी , बौद्ध धर्म की शिक्षा ली और गार्गी बनी । आज के जमाने में भी स्त्री को पढ़ाया ही इसलिए जाता है ताकि " वह संकट के समय काम आए " , बहु - मां बने और नौकरी क्यूं? , करोड़ो का आलीशान घराना है ना फिर पैसा क्यूँ कमाना है ? लेकिन छोटा सवाल ये पनपता है कि , समाज आज भी स्त्री को उत्पाद से ज्यादा कुछ नहीं समझता । और जो लोग स्त्री को स्त्री समझते है वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाते कि " स्त्री , देखो स्त्री अपने विचार रखती है ... हा हा हा " ।

विचार ? ; लेकिन क्यूं ना रखे विचार ?

पुरुष राजा : आपने देखा है काम काज कैसा चलता है यहां का ।

स्त्री रानी : हां देखा लेकिन समझ ना आया । प्राण प्रिये कोई मार्ग दिखाए जिससे मैं आपकी दासिनी बन पाऊं

पुरुष राजा : काम करो । रानी आप सभा में बैठो और अपने तर्क प्रस्तुत करो

स्त्री रानी : वो तो सारे लोग है ही करने को फिर मेरी क्या जरूरत है । आप बस हुकुम करो आपके लिए क्या करू मैं ?

पुरुष राजा : और आप अपने लिए क्या करेगी?

स्त्री रानी : मेरा अब कुछ आपका है , आपसे ही मैं हूं अन्यथा मैं मेरी हुई हो जाऊंगी। आप ही सब है अब ।

यह वार्ता सच है क्योंकि आज ऐसा हो गया है कि यदि लड़का चाहे स्त्री को स्त्री बनने की तो भी स्त्री पुरूष बनना पसंद करेगी या फिर गुलाम लेकिन स्त्री से उसे खुद घृणा है नफरत है । यह नफरत ही उसको स्त्री बनने से रोकती है ।

Chapter 4 : सोच आज़ाद नहीं है

काफ्का पैदा होता है दर्द तकलीफों को जिंदगी का आधार बना लेने से और दोस्तोवस्की पैदा होता है उस दर्द को हौले से खिसका लेने से । कैसी विडंबना है कि हम कोई एक पायदान चुन लेते है और विचारों के सागर में ठहर जाते है कि यही पायदान सही है जो गंदगी को धोएगा लेकिन ये होता है बंधन कि सोच आज़ाद नहीं है आज़ाद है आपका अहम कि आप सोचते है कि आप आज़ाद है क्योंकि आप विचार पेश कर रहे है ।

क्रिकेगार्द , सार्त्र जब भी अस्तित्व की बात करते है तो आजादी को मन की विडंबना नहीं मानते । और आतुर रहते है ये सोचने पर कि वो अपने होने का प्रमाण कैसे दे ? क्या वो विचारों के सागर में सही गोता लगा रहे है या फिर चूक हो गई है । कहने का मसला यही है कि क्या सोचना है और क्या नहीं ये तय आप खुदसे ना करे बजाए ये सोचे कि आप " सोचते है " यानी कि जो भी सही बात ( यदि अहम को हटाकर सामने वाले की बात सुनना पसंद करते हो तो ) लगे उसे झुककर स्वीकार किया जा सके चाहे वो बाते तर्क से सही लगे या फिर भाव से क्योंकि ज़रूरी नहीं जो बातें तर्कपूर्ण हो वही सही हो , कुछ बाते ऐसी है जो परिभाषित नहीं की जा सकती इसका मतलब यह नहीं है कि वो स्वीकारी नहीं जा सकती । यदि हर सवाल का जवाब दिया जा सकता होता तो दर्शन और philosophy , psychology & शास्त्र नहीं लिखे जा सकते थे क्योंकि सारी बाते एक ही ग्रंथ में सवाल सहित मिल जाती जो तर्क की होती ।

Chapter 5 : सुबह आप आप कहलाएगी?

रोज जब आप सुबह उठते हो तो एक हलचल होती है सीने में लेकिन वो हलचल अपने पैरों पे अब काम करने के जैसे हो तो सुकून का पर्दा बैठता है आपके चादर पे। मेरे खाना बनाना , झाड़ू लगाना और सुकून की काली चाह पीना ये अंदर तक आवाज लगता है कि कितनी आज़ाद पंछी हूं मैं क्योंकि अब काम खुद करने में लुफ्त मिलता है और लुफ्त के अपने मजे है । दायरे हम खुद बनाते है उसे तोड़ो और देखो खुदके भीतर ... एक पुंज होगा रौशनी का जो सिर्फ तुम्हारा है सिर्फ तुम्हारा ...

Chapter 6 : बेहद मुश्किल है ?

बेहद मुश्किल है खुदसे पूछना कि क्या हुआ और क्या है तुम्हारे अंदर और जनाब पूछ भी लिए तो उससे भी ज्यादा मुश्किलात ये है कि हम बर्दाश्त कर पाए अपनी कमियों को , ये असंभव है लगभग नामुमकिन कि इंसान खुदको पहचानके अपनी हरकतों को समझे और उसको स्वीकार कर ले। ये लगभग नामुमकिन है लेकिन " लगभग " में उम्मीद होती है कि 0.1% ही सही कोई हो सकता है जो " खुदसे इतना प्यार करे कि खुदको बिगड़ने की तमाम कोशिशें जो वो कर रहा है उसे पहचानके अपनी ही कोशिशों को नाकामयाब कर दे । 
                             जिंदगी में मामूली मान लेना खुदको आसान है लेकिन इस आसान को आसान समझ लिया जाना तुम्हारी कमजोरी भी है और तुम्हारी नाकामयाबी भी कि" जो होने को पैदा हुए थे वो हो ना सके " । कभी-कभी जिंदगी थका देती है जैसे लाचार बना देती है और हम जिंदगी को गलतियों में खो जाते है कि खुदको नजरअंदर कर देते है और वही घड़ी है जब हम " खुदको बिगाड़ना शुरू कर देते है " और सोचते है कि नहीं , पूरी फ़ज़ियत , जुर्म तो कायनात का है ईश्वर और किस्मत का है लेकिन कुछ तो हिस्सा होगा जो तुम्हारा होगा ।

लेकिन जो खुदके अस्तित्व को नकारेगा नहीं वही है जो खुदको बनाने में सही मायने में लगा रहेगा वरना बिगाड़ने की शुरुआत सबसे पहले खुदसे होती है । बस हम समझ नहीं पाते क्योंकि हमारा " अहम " हममें सुकून की बजाए नफ़रत भर देता है । 


ये खुदको खो देना है 

Chapter 7 : डर से डरना मना है ? 

ये बात उतनी है सत्य है जितनी आपका यहां पढ़ा जाना चाहे वो शौक के लिए हो या कुछ अंदर खोजने के लिए । और वो बात है , आपका डर को सही ठहराना ...!
आपका क्या लगता है कि डर, सफल होने का सही रास्ता हो सकता है ।
 ये वही रास्ता होता है जब इंसान की चंचल चाहते हर गलत बात को सही दिशा में सही ठहराने की कोशिश करती है लेकिन क्योंकि? क्योंकि वो चाहते मोह को यानी कि तात्कालिक चरम खुशी को संतुष्ट करती है । 

यानी डर को आप सही ठहरा रहे है महज इसलिए कि आप डरते है असफल होने से यानी आपका होना इस बात से तय है कि आप सफल है या असफल !!! और डर को सही ठहरा गए तो यकीनन , ईर्ष्या - घृणा को भी सही ठहरा दोगे । 

Chapter 8 : 
रूह से मजबूत लोगो को कोई ग्रुप में शामिल नहीं करना चाहता क्योंकि वो उन ग्रुप वालो को बाहर की नहीं

और जब किसीको बस दो कदम दूरी में खड़े रहे इंसान की एनर्जी तक महसूस हो जाए और अंदर से बिना किसी शब्दों के , ना पूरी जानकारी के उसकी अच्छी बुराई भाप जाए तो अंधेरा और घना हो जाता है क्योंकि कभी-कभी अच्छा होता है यदि हम किसी इंसान की फितरत शब्दों में ना सही पर महसूस के रूप में भी ना जाने । क्योंकि ज्यादा सच जानने या महसूस हो जाने से आप अकेले पड़ सकते है , और ये दुनिया सच रिश्तों से ज्यादा , दो पल की खुशी के रिश्ते बनाने में भरोसा रखती है क्योंकि खुदको बदलने से , अकेला रहने से अच्छा है कि दूजे को बदला या उसी के मोह में डूबा जाए एंड आखिर में एक गोला यानि कि ग्रुप बन जाता है अनकहा ग्रुप जिसमें अकेलेपन से भागने वाले या दूजे के इशारों में इशारे लगाने वाले लोग , आपस में " हां - हां जी , एक दम सही बोल रहे " कि बाते करके अपनी नकली पहचान बना देते है और इन्हीं की बाहरी खुशी देखके लोग इंस्पायर होते है और वैसा हो ग्रुप बना देते है फिर जो लोग खुदको जानना चाहते है वो सचमे अकेले रह जाते है क्योंकि उन बेबाक , रूह से मजबूत लोगो को कोई ग्रुप में शामिल नहीं करना चाहता क्योंकि वो उन ग्रुप वालो को बाहर की नहीं


Chapter 9 : 
सीमाओं में बंध जाते है सीमाओ

हम अक्सर ऐसे सीमाओं में बंध जाते है जो रूढ़ियों ने तय किए हैं और मेरे लिहाज से यदि वो रूढ़ियां किसीको नुकसान नहीं पहुंचा रही तो यक़ीनन आपको वो शालीनता से अपना लेना चाहिए , " विनम्रता " की निशानी होती है यह कि आप " आस्था " को समझ ले लेकिन यदि रूढ़ियां नुकसान पहुंचाने वाली है तो " विरोध " भी करे वो भी शालीनता से . यह भी " विनम्रता " की निशानी कही जा सकती है ।

मतलब : क्या नुकसान दे रहा और क्या नहीं , यह तय करता है कि आपका बर्ताव क्या होगा ... हर बात पर अकड़ जाना मूर्खता होती है बस इसलिए कि वो बात आपने कही है ...

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Chapter 10 : लेकिन अच्छा बनना आसान है और अच्छा बने रहना बेहद मुश्किल / हम चलते रहे , चलते रहे ... "

" जब आपके पांव के छाले आपको देखके हँसे और आप पागलो कि तरह उसे देखके और हँस दे " , इससे ज्यादा विडंबना क्या होगी , जब दुख में सुख ना सही लेकिन दुख को भी मजाक समझ लिया जाए ।

जब चीज़ें हमारे हिसाब से नहीं होती तो हम पानी को हाथ में पकड़कर जिद्द नहीं करते कि , हमें इसे संभालना ही होगा । बल्कि , उसे हाथों से बहने देते है क्योंकि पानी की सीरत है बहना और उसे संभालने की ताकत एक स्टील के बर्तन में भी नहीं होती क्योंकि प्यास हमें लग ही जाती है ।

जब पानी ने अपनी नियति नहीं चुनी, तो हम मामूली से चींटी, कैसे अपनी भोर की नन्ही किरण-सी रौशनी चुन सकते है। हाथों में एक ही फ़लसफ़ा होता है कि , " हम चलते रहे , चलते रहे ... "

यक़ीनन मेरा ये कहना आसान लगता है और उसको जीवन में पिरोदेना मुश्किल , लेकिन अच्छा बनना आसान है और अच्छा बने रहना बेहद मुश्किल क्योंकि अच्छा बने रहने में दिक्कत यह है कि " आपको पानी बनना होगा " । साफ पानी , जिसमें H२O के अलावा किसी चीज़ कि मिलावट ना हो । और ये मुश्किल नहीं बल्कि , लगभग नामुमकिन होता है । लेकिन असंभव नहीं होता । आपको तपस्वी नहीं बनना है , बस उतना ही खुदको , रोकना है जितना आपका स्वार्थ, किसी और के स्वार्थ से टकराके आगे बढ़ना चाहे और यदि आप आगे बढ़ गए तो साफ पानी में छोटे-छोटे जीव आ जायेंगे । जो आपके माथे में घमंड की चादर उड़ाके बस जायेंगे । बस आपको यही करना है कि,

" जब टकराव हो तो, अपने स्वार्थ को कहो कि वह, सामने वाले के स्वार्थ से हाथ मिला दे " ... बाकी आप समझदार लगते है ...

~ इसपे कोई शक है कि ये मैंने यानि कि शिवानी ने नहीं लिखा है ?
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