“India Budget Reality: Political Conflict, Capitalism vs Welfare & The Truth Behind Budget Session” By Indiandarshiki
"Left & Right Wings चील के वो दो पंख है जो एक ही धड़ से चिपका हुआ, एक ही दिशा में जा रहा है बस दो अलग फितरत लिए हुए है । " भारत का ये बजट सत्र अपनी मूल भावना को पूरी तरह खोता हुआ दिखाई दे रहा है जो राजनीतिक उद्देश्य जनता की परेशानियों और सुधार की आशंकाओं को लेके होता है वो लक्ष्य अब आपसी बेज़्ज़ती और कलह का मौदान बन गया है । या ये कहे कि पक्ष - विपक्ष दोनों ही सच को छुपाना चाहते है ताकि कुछ बड़े घोटाले छुपाए जा सके । क्योंकि बजट सत्र एक उम्मीदों का आगस होता है जिसके लिए दोनों पक्ष अपने "अहम" को भूलकर शिष्टाचार से आगे बढ़ते है ।
फिर क्यूं दोनों पक्ष अभी के हालातों को देखकर सड़क सुरक्षा या किए गए दावों , बदलावों पर आशंका की बात नहीं कर रहे । इस असहज स्थितियों ने जो घृणा का रूप लिया है वो षडयंत्र की तरह सच को छुपाकर क्लेश को उजागर करके नीचा दिखाने जैसा लग रहा है । बात ये है कि विपक्ष भी वो सवाल नहीं उठा रहा जो बजट सत्र की नींव है जो बजट के दावों का विश्लेषण कर सकती है बहरहाल विपक्ष, सत्ता की अपवित्र-आक्षेपित पहचान को उजागर करने में इतना लीन है कि वो भूल गया कि " बजट सत्र का भाव क्या है " ।
वही सत्ता पक्ष अपनी वो जिम्मेदारी भूल रहा है जिसके लिए जनता के बहुलता ने उसे चुना है और वो जिम्मेदारी है " बजट सत्र में बजट के उतार-चढ़ाव की आलोचना और विवाद " संसद के सौहार्द वातावरण में करने देने की । क्योंकि सरकार ही है जिसकी संसद में बहुमत होती है और पहल वही करती है कि सत्र की शुरुआत नियमों के रूप में हो । चुकी हुई नहीं क्योंकि विपक्ष को बोलने नहीं दिया गया और पूरा सत्र गर्मा-गर्मी आगोश में निकल गया । और जब मुंह को बिना हाथ से दबाए बंद करा दिया जाए तो दबाने वाले के हाथ गंदे नहीं नजर आते बल्कि मुंह से दबा हुआ इंसान ही आक्रामक और हिंसात्मक नजर आता है क्योंकि हाथ नहीं दिख रहा जो मुंह को दबा रहा है बस अदृश्य हाथ है जो उसे दबा रहा है जिससे पीड़ित व्यक्ति विवेक ही खो रहा है क्योंकि अब वो रास्ते से भटक चुका है क्योंकि यही तो दबाने वाला व्यक्ति चाहता था कि , " सामने वाला व्यक्ति मुंह से बंद रहे और हाथ भी मेरे गंदे ना हो " ।
बजट की मुख्य प्राथमिकता की बात की जाए तो बजट अभी की राष्ट्रीय जरूरतों और भविष्य के ढांचे को देखके बनता है जो आंतरिक - बाहरी सुरक्षा और व्यवस्था का पैमाना है कि देश की नींव कैसी होगी और किस तरह का देश हम चाहते है । लेकिन अभी की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की कूटनीति को देखके रक्षा क्षेत्र में निवेश करना बजट की जरूरतों का पहला हिस्सा हो गया है जबकि इस बड़े हिस्से की ताक पर वो अहम हिस्सा छुप गया जो राष्ट्र को अंदर से सशक्त और शांतिपूर्ण बनाता है जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा , प्रशासन, आय और करो का आर्थिक रूप आदि । यह वो क्षेत्र है जहां से देश अंदर से मजबूत और समृद्ध होता है जो गुणात्मक रूप लेता है लेकिन विश्व की तकनीकी झुकाव को देखके भारत को AI - औद्योगिक और नवाचार - अनुसंधान क्षेत्र में बजट का खर्चा बढ़ाना भारत की मजबूत पहचान का हिस्सा कहलाता है ।
ऐसी विडंबना में एक भाग , जो राष्ट्र की अमूर्त संपत्ति और मूर्त विकास के बीच फंसा है , देश की संस्कृति-सभ्यता को एक विचारधारा पर ही खड़ा करके एक ही दिशा तय करता है और अभी वो भाग की दिशा है , पूंजीवाद ( capitalism ) जो राष्ट्र के बाहरी विकास को मजबूत करता है बजाय विपरीत मौलिक ढांचा दबा रह जाए । जो " सामाजिक कल्याण और न्याय " की बात करता है वो हिस्सा अप्रत्यक्ष स्थिति में संघर्ष करता रहता है । फिर बजट की संरचना हालातों के मारे बनाई जाए या फिर जो मौलिक रूप है उसको देखके कल्याण की अपेक्षा करके बनाई जाए ।
बजट का उल्लेख संविधान में नहीं है लेकिन इसका मूल उद्देश्य जिस भी शब्द में खोजा जाए , इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश का बजट , पारिवारिक प्रबंधन जितना आसान नहीं है इसमें बड़े स्तर पर भविष्य की उम्मीद और अतीत की गलती बखूबी दिखती है और संवेदना का असर तात्कालिक होता है इसलिए बजट बदलते रहने की फितरत लेके आता है जिसमें योजनाएं और नीतियां भी हाल की स्थितियों को देखके ही तय होती है। क्योंकि जैसा विश्व स्तर में व्यापारिक चहल कदमी हो रही है , केंद्रीय बैंको कि मौद्रिक नीतियां भी, नीतिगत गलियारों ( पॉलिसी कॉरिडोर ) के रास्ते ऐसे बदलती रहती है जैसे हर दिन बदला हुआ कपड़ा ।
सबसे ज्यादा फिक्र करने की बात यह है कि हम किस तरह का आयाम - तंत्र चाहते है अपने देश में ? क्या व्यापार , वाणिज्य और समागम ही " राष्ट के विकास " का सही पैमाना है ? विकास को संरचना के ढांचे के आकारों में क्यूं देखा जाता है जबकि समाज के ज्यादातर वर्गों या सभी लोगों को खुशहाल - आनंदभरी जिंदगी देना का काम होता है शासन - प्रशासन का । फिर वो जिस वादों के साथ सत्ता संभालते है उसी वादों को हथियार बनाके खड़े हो जाते है कि आप कोई " प्रत्यक्ष लोकतंत्र " नहीं जिसमें Recall की व्यवस्था हो जिसमें जनता जिसे चुनने की शक्ति रखती है वही जनता ताकत रखती है वादे पूरे ना होने पर उसे गिरकर पीछे ढकेलने की । लेकिन ये व्यवस्था नाजुक है क्योंकि कागजी स्थिरता ना हो पाने से राष्ट्र का प्रबंधन तंत्र ढीला और अस्थिरता से डगमगा सकता है । चाहे स्थिरता हो लेकिन स्थिरता आकर भी यदि सत्ताधारी लोकतंत्र की मूल आत्मा को
समझ ना सका तो इससे अच्छा है कि सत्ता ही खत्म हो जाए कि जनता से गलती हो गई । लेकिन चाहे जो पार्टी हो डर तो दोनों को बराबर होगा इसलिए प्रत्यक्ष शुद्ध लोकतंत्र का सामना करना कठिन जान पड़ा राजनीति को ।
इसी आधार से तय होता है कि बजट का लेखा-जोखा , प्रतिवेदन का भाव जो भी हो उसका सफलता से लागू होना ही उसको सार्थक बनाता है अन्यथा उसका होना ऐसा ही है जैसा मूल संविधान में
मंत्रिपरिषद का क्योंकि शक्ति उनके हाथों में होती है जो मूल में नहीं है लेकिन सरकार वही चलते है यानी कि कैबिनेट । इसलिए बजट का दृष्टिकोण मायने रखता है और उससे भी पहले ये मायने रखता है कि हम कैसा देश चाहते है ?
वो राष्ट्र जहां जनता भूखी रहे , सिलेंडर 5 हजार का रहे तो चलेगा लेकिन शहरीकरण , पूंजीकरण और औद्योगिक विकास होना जरूरी है भलाई आम जनता है एक बड़ा हिस्सा आम जरूरत भी पूरी ना कर पा रहा हो ।
India ka budget sirf numbers ka game nahi hai — yeh ek aaina hai jo dikhata hai ki hum kis direction mei ja rahe hain.
Aaj ka budget session apni asli bhavna se hatkar ek political battlefield ban chuka hai, jahan policy se zyada power aur perception ka khel chal raha hai.
Is article mei hum samjhenge:
• Budget session ka original purpose kya tha
• Kaise political conflict ne usse impact kiya
• Capitalism vs Social Welfare ka real struggle
• India kis tarah ke development model ki taraf badh raha hai
• Yeh sirf ek analysis nahi, balki ek sawal hai
Hum kaisa desh banana chahte hain?
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