Freedom From Feelings | F FROM F : Inner Detachment & Emotional Autonomy

Freedom From Feelings | F FROM F 


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[ वाक्यांश

१) रायली : दादा मैं तपड़ चुकी हूं , मेरी रूह झिल्ला चुकी है , मुझे बस सुकून होना और ये ईर्ष्या जो मेरे अंदर है वो मुझे मार रही है , मै खुदको पीड़ित महसूस कर रही हु ... 


२) दादा : तुमने इजाजत दी है लोगों को कि वो तुम्हे दुख दे सकते है गाली दे सकते है इसलिए तुम इतनी दुखी हो , तुम भावना को मुट्ठी में रखना नहीं जानती


३) मैम : अब पता चला , तुम्हारे साथ किसीने कुछ गलत किया ही नहीं । हम अपने साथ खुद गलत करते है ये सोचके कि, लोगोने गलत किया है । 


४) लेखक : तुम दुखी हो क्योंकि तुम मानते हो कि ( तुम्हे दुख मिला है ) , और मैं आज अब इस सोच से आज़ाद होती हूं कि ( मैं दुखी थी और मुझे दुख मिला है ) 


" शुरू होता है - " 

भावना से आजादी यानी कि, किसी को एक पल में त्याग देने की क्षमता और अपनी भावना को किसी भी इंसान - वस्तु से ऐसे आज़ाद करने की क्षमता जैसे भरोसा टूटने पे भी हर शख़्स पे भरोसा फिरसे किया जा सके...

मतलब , जब आप भावना से भी आज़ाद हो जाते हो तो , भरोसा दुबारा टूट जाने का डर ही खत्म हो जाता है और यह सच है जो आज अभी इसी समय मैंने महसूस किया ... 

               यही कि, दुनिया अपनी बुद्धि से काम करती है और उससे हर तरह के फैसले ऐसे करती है जैसे भावना एक कचरा सा हो जबकि सच ये है कि भावना यानी कि गुस्सा , प्रेम या दया यदि किसी इंसान - चीज पे निर्भर ना हो और उससे आज़ाद हो जाए तो यकीनन वो हमें " दुख के डर " से भी आज़ाद करेगी । जिससे भरोसा टूट जाने के बाद भी भरोसा करना आप छोड़ेंगे नहीं क्योंकि ये भावना आपकी है किसी और की नहीं , क्योंकि ये आपका व्यक्तित्व है जो आपका है किसी और का नहीं... 


लेकिन अब सवाल ये पनपता है कि,

हम दुखी होते ही क्यूं है ? 

क्योंकि चाहते होती है ...

चाहते क्यूं होती है ?

क्योंकि हममें भावना है जो भोजन मांगती है ...


और भोजन से वो जिंदा रहती है ?

हां उसको जवानी-सा महसूस होता है चाहे बूढ़े हो जाओ...


फिर वो गलत है ?

नहीं वो गलत नहीं लेकिन उसका अंतहीन बहाव गलत है ...


अंतहीन बहाव ?

हां , बहाव यानी कि ज्ञान मिलना काफी नहीं है उसपे सोचना और खुदसे सही-गलत चुनना ही आंतरिक स्वतंत्रता है यानी कि आजादी जो आपको भावना के बहाव को रोकने में मदद करती है।


रायली एक ख़ास लड़की जो हर तरह के चोटों को आत्मा में एक गहरी बोझिल-सी महसूस कर रही थी , वो सवाल खड़ा करती है शिक्षक से ,


रायली : मैम, मैं अच्छी लड़की हूं भोली हूं फिर लोग मेरे साथ धोखा क्यूं करते है ।


मैम : किसने कहा कि तुम " पीड़िता " हो , तुम्हारे साथ कुछ गलत नहीं हुआ ।


रायली : आपको क्या पता मैम, मैंने तो दोस्ती में भी बेवफ़ाई देखी है , आर्थिक - भावनात्मक ना जाने कैसे-कैसे मैंने मदद करी लोगों की , पर मेरे बुरे वक्त में मुझे खुदको अकेले संभालना पड़ा ।


मैम : प्रेमी तुम्हारी दोस्त , उसने तुम्हे धोखा दिया । तुमको तकलीफ हुई , तुमने भरोसा करना ही बंद कर दिया ? 


रायली : हां मैम, मैं अब एक पैरानॉइड व्यक्ति बन गई हूं। मुझे डर लगता है अब नजदीकियों से...!


मैम : बहुत खूब , शानदार ... ऐसे ही निराशावादी बने रहो , डर-डरकर जिंदगी जियो । 


रायली : क्या ? आप बोल रही , मैं ऐसे ही घुट-घुटकर जीती रहूं ?


मैम : तुम जाओ यहां से , तुमसे अच्छी वो लड़की है जिसने तुम्हे धोखा दिया और वो किस्मत बेहतर है जो तुम्हे हराती है बार-बार हर बार , क्योंकि तुम हो ही इसी के लायक ।


रायली : आप कह क्या रही है , मेरे साथ इतना गलत हुआ और आप बोल रही मैं ही बुरी हूं। मुझमें प्रतिभा है और एक बेहतर इंसानियत है फिर मैं कैसे हार के काबिल हुई...!?


मैम : आओ, तुमको मैं एक जगह ले जाती हूं


दोनों एक सड़क के लबालब गलियारे के किनारे गए जहां बदबू और गंदगी थी , जहां हर जिंदगी दुखों से भरी लगती थी लेकिन ऐसा कुछ था नहीं ... 


मैम : देखो ये लोग तुमसे ज्यादा दुखी दिखते है , किसके पैर कट गए तो कोई लड़की बलात्कार की शिकारी है तो किसके पैसे लुट गए तो किसीकी छोटी बच्ची ही चल बसी और सारे लोग आधा पेट खाना खाते है । देखो कितने दुखी है , अब बताओ इनकी स्थिति तुमसे बेहतर है या बत्तर जान पड़ती है ।


रायली एक गहरे सन्नाटे में : मैम, मैं... ये सब क्या है ... ये लोग हर पल दुखों के सागर में डूबते हुए जिंदगी गुजर क्यूं कर रहे है।


तभी वो एक बच्चे से टकराई जो पतंग लेके छत का रास्ता देखते हुए भाग रहा था ...


बच्चा : दीदी क्या आप भी , यहां काहे खड़ी है ...

रायली : ये बताओ तुम कैसे हो , तुम ठीक हो...

बच्चा : हां मै तो ठीक हूं , मस्त हूं और वो देखो मेरा दोस्त आ रहा ... मैं जाता हूं ।


मैम : देखो वो खुश है जबकि खुश होने की वजह ही नजर नहीं आती ...


" रायली कुछ समझ नहीं पाई कि ये लोग शांत क्यूं है , हर दिन एक जैसा है इनका , लेकिन कुछ ज्यादा पाने की लालसा ही नहीं है और इतने धोखे ख़ाके भी कहते है , हम खुश है . " 


पास के दादा बोले : बेटा क्या हुआ ...?

मैम : रायली को बताओ दादा कि यहां की जिंदगी शांत में क्यूं है ...


दादा : बेटा तेरी मासूम आंखों से पता लगता है कि तुम बेहद दुखी हो , हारी हुई हो ... देखो दुख तो जिंदगी का वो हिस्सा है जिसमें सुख चुपके से छुपा होता है ... रास्तों में गंदी दिखे तो जरूरी नहीं कि वो गंदी के नीचे या पीछे खूबसूरत मंजर ना हो ।


रायली : दादा मैं तपड़ चुकी हूं , मेरी रूह झिल्ला चुकी है , मुझे बस सुकून होना और ये ईर्ष्या जो मेरे अंदर है वो मुझे मार रही है , मै खुदको पीड़ित महसूस कर रही हु ... मैं चाहती कि... मैं पता नहीं क्या चाहती ... 


दादा : आओ , वो देखो उसने दो दिन से खाना नहीं खाया और हम लेजाके दे खाना तो कहता है , इससे क्या होगा ? मेरा तो व्रत है व्रत ...

      पता है वो मजदूर है और खाना नहीं खा रहा क्योंकि वो अपने लकड़े को पढ़ाना चाहता है ताकि बड़ा होके वो नौकरी कर सके और जिंदगी को बेहतर तरीके से समझ सके ।


रायली : तो वो दुखी है ...

दादा : रायली , भावना है जो दुख - सुख पैदा करती है लेकिन वो आपको तड़पाती तभी है जब आप अपनी भावना को किसी और पे निर्भर बना दो । और यही है , " भावना का बंधन " जिससे हम सब खुद बंध जाते है और हमें लगता है कि किस्मत , समाज और लोग हमें दुख दे रहे है जबकि हमने इजाजत दी है उन्हें, कि वो हमें दुख दे सके । 


रायली : वो मुझे गाली दे फिर ...? और मैं समाज का हिस्सा हूं मुझे उनसे फर्क तो पड़ेगा ही ...


दादा : हिस्सा हो लेकिन समाज के साथ अपने संबंधों को बाहरी तौर पे रखो, एक नैतिक आचार-विचार तक । 

        अक्सर लोग समाज के नियमों को अपनी जिंदगी का नियम बना देते है और इस कारण ही समाज के नियम मजबूती से जमीन में वैसे-के-वैसे ही गड़े रहते है , जबकि नियम परिस्थितियों के अनुरूप बदलते रहते है । इसी वजह से लोग दुख भोगते है और जाने अनजाने दुख दे भी देते है । 


                और तुमने इजाजत दी है लोगों को कि वो तुम्हे दुख दे सकते है गाली दे सकते है इसलिए तुम इतनी दुखी हो , तुम भावना को मुट्ठी में रखना नहीं जानती । 


रायली : मतलब , समाज के नियम पत्थर की लखीर नहीं है , ये पीढ़ियां बदलते ही बदल जाते है ... जैसे 60's , 90's , 20's के जमाने के गाने ...


मैम : अब पता चला , तुम्हारे साथ किसीने कुछ गलत किया ही नहीं । हम अपने साथ खुद गलत करते है ये सोचके कि, लोगोने गलत किया है । 


" मेरा मानना है , जो जैसा है उसे वैसा ही छोड़ दो

उनके बर्ताव को , रीतियां पे छोड़ दो" 


" उनकी बेवकूफी दया का पात्र बन जाएगी

जब कारण जानोगे तो हालात खुद दया बन जाएगी "


" उन्हें बदलने की फितरत तुम अब छोड़ दो

अपनी सोच परोसके , 

उनके खाने या ना खाने पे छोड़ दो "


" भावना से आजादी " का मतलब है , खुदको उन शख्सियत से आज़ाद कर देना जो जाने - अनजाने या सोचके तुम्हे दुख देते है , तड़पाते है ... क्योंकि वो बर्ताव उनका अपना है तुम .....

          तुम दुखी हो क्योंकि तुम मानते हो कि ( तुम्हे दुख मिला है ) , और मैं आज अब इस सोच से आज़ाद होती हूं कि ( मैं दुखी थी और मुझे दुख मिला है ) " 


~indiandarshiki 


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