“AI, Trump aur New World Order: Geopolitics ko Philosophy se Samjho” Capitalism | Communism | Kya Nayi Cold War Shuru Ho Chuki Hai?
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति " जेम्स मुनरो " के तत्वावधान में गढ़े " मुनरो सिद्धांत " चर्चा का विषय है, जो पश्चिमी खेमे या पश्चिमी गोलार्ध में अपने वर्चस्व को स्थापित करते हुए प्राकृतिक संसाधनों पर अमेरिकी हितों के अनुरूप उपयोगिता का क्रियान्वयन करता है।
अमेरिका तक पहुँच की पुरानी रीतियों का पहला दाव है टैरिफ , ट्रम्प टैरिफ, जो पुरानी संस्कारों की परंपराओं से ही मेल खाता है, क्योंकि अमेरिकी इतिहास की महाशक्ति बनने की हुड़ में वह कूटनीतिक फैसले लेता आया है, चाहे घरेलू आर्थिक-परिस्थिति मंदी अस्थिरता तक पहुँच जाए जैसे 1921 और 1970-91 में देखा गया है वही, " तकनीक AI " ko सहारा बनाकर " अप्रत्यक्ष शीत युद्ध " की शुरुआत देखी जा सकती है ।
मुनरो सिद्धांत एक वैसा ही पड़ोसी देशों पर वर्चस्व को उभारता है जैसा फिलहाल डोनरो सिद्धांत एकाधिकार चाहता है, जिसकी पहल डोनाल्ड ट्रम्प ने वेनेज़ुएला की संप्रभुता को संकट में डालकर शुरू की। और इस पहल का आगाज़ असंतुलित स्वार्थपूर्ण टैरिफ से हुआ, लेकिन महाशक्तियों की इस पुरानी प्रभुत्व विचारधारा की लड़ाई में हिंद-प्रशांत क्षेत्र पश्चिमी एशिया की राजनीति-आर्थिक कूटनीति ही क्यों घेरे में आती है ?
क्योंकि पश्चिमी एशिया सहित हिंद-प्रशांत क्षेत्र प्राकृतिक तेल संसाधनों, धातुओं और परमाणु ऊर्जा संसाधनों के साथ-साथ एक अलग धार्मिक-दार्शनिक विरासत भी रखता है, जो विचारधारा की पूर्व-पश्चिम की लड़ाई में इस क्षेत्र को खासा आत्मनिर्भर और गरिमामय बना देता है। इसका बेहतरीन उदाहरण है यूनानी-अरब प्रदेशों का कम तकनीकी उपलब्धता के बावजूद मजबूत आर्थिक आत्मनिर्भर बनना। श्रमशक्ति और एकता के आदर्शवादी निर्णायकों के चलते, यह क्षेत्र 1990 के दशकों में रूस-अमेरिकी विचारधारा के आपसी संघर्षों के बीच पिसने के बावजूद, आंतरिक ऐतिहासिक शक्ति के विरासत के दम पर अपनी पहचान बनाने में सफल हुआ।
जिस कारण अमेरिका जानता है कि पश्चिमी एशिया, जैसे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई इरान, सीरिया, गाज़ा पर नियंत्रण हेतु रक्षा तकनीक का व्यापार करना कितना ज़रूरी है, क्योंकि वाणिज्यिक समझौता महज़ आपसी लाभ तक सीमित नहीं होता। यह व्यापार का खुलापन पूंजीवाद को पोषित करते रहने की दस्तक भी होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप में अमेरिकी प्रभुत्व को बनाए रखने का ज़रिया है। यह रक्षा समझौता देश की आंतरिक सुरक्षा की ज़रूरत तो है ही, लेकिन यह निर्भरता की दिशा में कदम भी है, क्योंकि यहाँ खरीदार-विक्रेता पर निर्भर रहकर अपनी विदेशी आर्थिक तकनीकों की उसी अनुरूप ढलने पर विवश हो जाएगा। क्योंकि समझौता करता को यह समझौता मुख्य रूप से अपनी पड़ोसी देशों से सुरक्षा के तौर पर करना होगा, जिस कारण यहाँ तो भारत आत्मनिर्भर हो जाए, जैसे चीन, रूस और अमेरिका हैं, या तो पड़ोसी देशों से खिचतान के चलते अप्रत्यक्ष-अनौपचारिक तौर पर महाशक्तियों के किसी खेमे में ढल जाए।
यह वर्चस्व प्रभुत्व का दौर 1991 की नई विश्वव्यवस्था के शुरुआत से जन्मा है जो आवश्यकताओ को पैदा करके औद्योगिक तकनीकी-युग की नई अर्थव्यवस्था गढ़ता है । इस युग की शुरुआत भलई 1990 से देखी जा सकती हो, लेकिन पहल की आशंका 1945 से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही विचारधाराओं की लड़ाई वाली शीत युद्धकारी नीतियों से भी देखी जा सकती है। लेकिन भूमंडलीकरण और अब आधुनिक प्रौद्योगिकी - प्राकृतिक संसाधनों को एकाधिकार में लाने की इस गति में विकसित देश ऐसे आगे निकल रहे है जैसे पूंजीवादी विचारधारा का पैमाना ही एकमात्र विकसित पैमाना हो । जहां खुशहाली के बजाय आर्थिकी-वित्त ज़रूरी हो जाता है जिसकी चेतावनी कार्लमार्क्स, हाइडेगर, सार्त्र , नीत्शे से लेकर गौसेंडी तक ने दी है जो औद्योगिक क्रांति को " मानवतावाद के अंत " की शुरुआती रुख समझते थे । जिसकी विरोधी पहल के तौर पर बोलशेविको ने रूसी क्रांति का इतिहास रचकर नए ध्रुवीय व्यवस्था कायम की ।
जब-जब एक विचारधारा अपने आप में ही हावी हो जाए, तो उस विचारधारा का कट्टर रूप अपना प्राथमिक आदर्श मूल्य ही खो देता है। फिर उस विचारधारा के खिलाफ या तो दूजी ठोस परिवर्तनकारी विचारधारा का प्रभुत्व आ सकता है, या उसी के समर्थक जनता क्रांति कर बैठती है। ऐसे में नई विचारधारा का जन्म संशोधित रूप में उभरता है। यदि वह कट्टरता या हिंसक पीड़ा का रूप न ले, तो नई क्रांतिकारी विचारधारा यूँ ही मूल्यवान और दोषरहित बनी रहती है।
लेकिन हाल के परिदृश्य में पश्चिमी विचारधारा और अमेरिका का वर्चस्वकारी बर्ताव , संप्रभुता को चुनौती देकर, देश की निजी सभ्यता, संस्कृति और राजनीतिक व्यवस्था तक को खतरे में डाल सकता है। ऐसे, जैसे ट्रम्प का वर्चस्व अब अमेरिका का वर्चस्व नहीं, वरन ट्रम्प का वर्चस्व बनकर उनकी अस्थिर बदलती बातों के अनुरूप बढ़ता-उतरता रहता है। चाहे शांति पुरस्कार की हुड में लिखी चिट्ठी हो या फिर ग्रीनलैंड-वेनज़ुएला की आंतरिक परिस्थितियों का नियंत्रण अपने हितों के अनुरूप ढालना हो या फिर पश्चिमी एशिया की आत्मनिर्भरता और विचारिक एकता पर अपनी सैन्य कार्यवाही के बल का प्रयोग करना ही हो ।
यह सभी तौर तरीके " Trump Doctrain " या " टोनरो सिद्धांत " का बेहतर व्याख्या हैं, जो भारत के साथ संपूर्ण एशिया और यूरोप के लिए खतरा पैदा करते हैं। जिस पर संतुलन के लिहाज़ से भारत ने EU और कनाडा, रूस से वैश्विक भू-आर्थिक समझौते किए हैं, ताकि किसी भी एक देश पर व्यापारिक और विचारिक निर्भरता कम हो और सामरिक हितों का ढाँचा संरचना व्यवस्थित किया जा सके।
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“ट्रम्प सिद्धांत से वैश्विक शक्ति संतुलन तक: क्या राजनीति और तकनीक बदल रही दुनिया?”
“भू-राजनीति + विचारधारा + तकनीक: वैश्विक सत्ता संघर्ष का दार्शनिक विश्लेषण”
“AI, ट्रम्प सिद्धांत और दुनिया की राजनीति — एक गहन दर्शनात्मक दृष्टि "
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